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दादूदयाल

'राजस्थान के कबीर' कहे जाने वाले दादूदयाल निर्गुण संत थे, जिनके अनुयायियों ने दादू पंथ बनाया। परीक्षा में उनके स्थान, रचनाएँ और शिष्य पूछे जाते हैं।

⏱ 2 मिनट पढ़ें✓ तथ्य जाँचे गए 15 अक्टूबर 2026

विषय-सूची

एक नज़र में

  1. निर्गुण उपदेश: कबीर की तरह उन्होंने कर्मकांड, जाति प्रथा, मूर्तिपूजा और रूढ़िवादिता का विरोध किया।
  2. दादू पंथ के साधु पाँच प्रकार के हैं: खालसा (पीठ नरायणा), विरक्त, उत्तराडो (उत्तरादे), खाकी और नागा।
  3. अन्य शिष्य: गरीबदास और मिस्किनदास (परंपरा के अनुसार उनके पुत्र), बखनाजी और माधोदास।

तथ्य

जन्मफाल्गुन शुक्ल अष्टमी, 1544 ई.; परंपरा के अनुसार अहमदाबाद (गुजरात) में, यद्यपि विद्वानों में मतभेद है
गुरुबुड्ढन (वृद्धानंद), जिनसे उन्होंने दीक्षा ली
संप्रदायसांभर में परब्रह्म संप्रदाय के रूप में आरंभ; उनकी मृत्यु के बाद दादू पंथ कहलाया
पीठ और देहांतनरायणा, फुलेरा के निकट, जहाँ ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी, 1603 ई. को देह त्यागी
अंतिम स्थानदादू खोल, भैराणा की पहाड़ी के नीचे की गुफा, जहाँ उनका पार्थिव शरीर रखा गया
रचनाएँदादू री वाणी और दादू रा दूहा, सरल सधुक्कड़ी भाषा में

जीवन

  • 1568 ई. से वे सांभर में रहे, धुनिया का काम किया और उपदेश देना आरंभ किया।
  • 1575 ई. में वे 25 शिष्यों के साथ आमेर आए और लगभग 14 वर्ष वहाँ रहे।
  • कहा जाता है कि 1585 ई. में वे अकबर से मिलने फतेहपुर सीकरी गए; इस भेंट की पुष्टि किसी ऐतिहासिक अभिलेख से नहीं होती।
  • 1602 ई. में वे नरायणा आए।

शिष्य

  • परंपरा के अनुसार उनके 152 शिष्य थे; इनमें से 52 ने केंद्र (थांभे) स्थापित कर उनके उपदेश का प्रचार किया।
  • रज्जब: जन्म सांगानेर में; उन्होंने दादू की वाणी को व्यवस्थित किया और रज्जब वाणी तथा सर्वांगी लिखी।
  • सुंदरदास: 1596 ई. में दौसा के खंडेलवाल वैश्य परिवार में जन्म; काशी में वेदांत पढ़ा, सुंदर विलास और ज्ञान समुद्र लिखे, और 1689 ई. में सांगानेर में देहांत हुआ।

याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं

  • दादू के स्थानसांभर, जहाँ उपदेश आरंभ किया · आमेर · नरायणा, पीठ और देहांत स्थल · भैराणा पहाड़ी, दादू खोल गुफा।
  • सांगानेररज्जब का जन्म स्थान · सुंदरदास का देहांत स्थान।

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