एक नज़र में
- निर्गुण उपदेश: कबीर की तरह उन्होंने कर्मकांड, जाति प्रथा, मूर्तिपूजा और रूढ़िवादिता का विरोध किया।
- दादू पंथ के साधु पाँच प्रकार के हैं: खालसा (पीठ नरायणा), विरक्त, उत्तराडो (उत्तरादे), खाकी और नागा।
- अन्य शिष्य: गरीबदास और मिस्किनदास (परंपरा के अनुसार उनके पुत्र), बखनाजी और माधोदास।
तथ्य
| जन्म | फाल्गुन शुक्ल अष्टमी, 1544 ई.; परंपरा के अनुसार अहमदाबाद (गुजरात) में, यद्यपि विद्वानों में मतभेद है |
|---|---|
| गुरु | बुड्ढन (वृद्धानंद), जिनसे उन्होंने दीक्षा ली |
| संप्रदाय | सांभर में परब्रह्म संप्रदाय के रूप में आरंभ; उनकी मृत्यु के बाद दादू पंथ कहलाया |
| पीठ और देहांत | नरायणा, फुलेरा के निकट, जहाँ ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी, 1603 ई. को देह त्यागी |
| अंतिम स्थान | दादू खोल, भैराणा की पहाड़ी के नीचे की गुफा, जहाँ उनका पार्थिव शरीर रखा गया |
| रचनाएँ | दादू री वाणी और दादू रा दूहा, सरल सधुक्कड़ी भाषा में |
जीवन
- 1568 ई. से वे सांभर में रहे, धुनिया का काम किया और उपदेश देना आरंभ किया।
- 1575 ई. में वे 25 शिष्यों के साथ आमेर आए और लगभग 14 वर्ष वहाँ रहे।
- कहा जाता है कि 1585 ई. में वे अकबर से मिलने फतेहपुर सीकरी गए; इस भेंट की पुष्टि किसी ऐतिहासिक अभिलेख से नहीं होती।
- 1602 ई. में वे नरायणा आए।
शिष्य
- परंपरा के अनुसार उनके 152 शिष्य थे; इनमें से 52 ने केंद्र (थांभे) स्थापित कर उनके उपदेश का प्रचार किया।
- रज्जब: जन्म सांगानेर में; उन्होंने दादू की वाणी को व्यवस्थित किया और रज्जब वाणी तथा सर्वांगी लिखी।
- सुंदरदास: 1596 ई. में दौसा के खंडेलवाल वैश्य परिवार में जन्म; काशी में वेदांत पढ़ा, सुंदर विलास और ज्ञान समुद्र लिखे, और 1689 ई. में सांगानेर में देहांत हुआ।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- दादू के स्थानसांभर, जहाँ उपदेश आरंभ किया · आमेर · नरायणा, पीठ और देहांत स्थल · भैराणा पहाड़ी, दादू खोल गुफा।
- सांगानेररज्जब का जन्म स्थान · सुंदरदास का देहांत स्थान।
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