एक नज़र में
- प्रोटेक्शन ऑफिसर 2022: मध्यकालीन मारवाड़ में शासक के बाद सर्वोच्च अधिकारी प्रधान था, दीवान नहीं।
- प्रोटेक्शन ऑफिसर 2022: लाटा या लाटाई फसल के रूप में चुकाया जाने वाला भू-राजस्व था, नकद नहीं।
- प्रोटेक्शन ऑफिसर 2024: उद्रंग उपज पर लगने वाला कर था।
- प्रोटेक्शन ऑफिसर 2024: पंचकुल स्थानीय प्रशासन की संस्था थी, केंद्रीय शासन, सेना या धर्म की नहीं।
व्यवस्था के अंग
| अंग | मुख्य शब्द |
|---|---|
| मुगलों से पहले | उद्रंग, लाग, मंडपिका, पंचकुल |
| शासक के अधिकारी | प्रधान, दीवान, बक्षी, खान-सामान, खजांची, कोतवाल |
| परगना और गाँव | हाकिम, आमिल, कानूनगो, पटवारी, ग्राम पंचायत |
| भूमि के प्रकार | खालसा, हवाला, जागीर, भोम, सासन |
| राजस्व वसूली की पद्धतियाँ | बटाई, कूंत, लाटा, ज़ब्ती, मुकाता, बीगोड़ी |
| कर एवं लागें | लाग-बाग, घासमारी, सवारखर्च, चूल्हा-बराड, चंवरी |
| जागीर और मनसब | जागीरदार, पट्टा, रेख, पेशकश, वतन जागीर |
मुगलों से पहले: आरंभिक कर और स्थानीय संस्थाएँ
- उद्रंग: उपज के भाग के रूप में लिया जाने वाला भू-कर। जी.एन. शर्मा के अनुसार यह संभवतः उन किसानों से लिया जाता था जिनका भूमि पर वंश-परंपरा से अधिकार था; अल्टेकर इसे स्वयं भू-कर, यानी भाग के समान मानते हैं।
- लाग: नियमित भू-कर 'भाग' से भिन्न एक कर; यह शब्द आज भी राजस्थान में प्रचलित है।
- मंडपिका: नगर, मंडी या बड़े गाँव का वह कार्यालय, जो मंडी-कर और चुंगी वसूल करता था।
- पंचकुल: पाँच या अधिक सयाने व्यक्तियों की स्थानीय संस्था, जो गाँव या गाँव-समूह का प्रबंध करती थी। यह स्थानीय झगड़े निपटाती, भूमि संबंधी कार्य देखती और भूमि-अनुदानों का पंजीकरण करती थी; राज्य उसके साथ काम करने के लिए एक अधिकारी नियुक्त करता था।
शासक और उसके अधिकारी
शासक अपने मंत्रियों की नियुक्ति स्वयं करता था। सभी रियासतों में शासन व्यवस्था लगभग समान थी, यद्यपि पदों के नाम और क्रम भिन्न होते थे। मुगलों से संपर्क के बाद कुछ नए पद बने और पुराने पदों को मुगल नाम दिए गए। मारवाड़ में मोटा राजा उदयसिंह के सलाहकार और सूरसिंह के प्रधान भाटी गोविंददास ने प्रशासन को मुगल ढंग पर ढाला।
| पद | कार्य |
|---|---|
| प्रधान | शासक का प्रधानमंत्री और मुख्य सलाहकार; सिद्धांततः पूरे असैनिक और सैनिक प्रशासन का भार उसी पर था। मारवाड़ में यह पद समय के साथ वंशानुगत हो गया। |
| दीवान | वित्त विभाग देखने वाला प्रमुख मंत्री: कोष और कर-संग्रह। जहाँ प्रधान नहीं होता था, वहाँ वह सर्वोच्च अधिकारी था; मारवाड़ में वह प्रधान के बाद आता था और समय के साथ उसने प्रधान की शक्तियाँ अपने हाथ में ले लीं। |
| बक्षी | सेना विभाग का प्रमुख: सैनिकों का वेतन और सेना से जुड़े अन्य कार्य। |
| खान-सामान | राज्य के लिए आवश्यक वस्तुएँ खरीदना और भंडार में रखना; राज्य के कारखाने उसके अधीन थे। |
| खजांची | आय-व्यय का हिसाब रखने वाला कोषाध्यक्ष; मेवाड़ में उसे कोषपति कहते थे। |
| कोतवाल | नगर में शांति-व्यवस्था: चोरों को पकड़ना, भाव तय करना, नाप-तोल की जाँच। |
| दरोगा-ए-सायर | चुंगी और आवागमन शुल्क की वसूली करने वाला। |
प्रांत, परगना और गाँव
| स्तर | पुस्तकों के अनुसार |
|---|---|
| प्रांत (सूबा) | अकबर के समय अजमेर, अजमेर सूबे की राजधानी था, जिसमें सात सरकारें थीं; इनमें अजमेर, चित्तौड़, नागौर और रणथम्भौर शामिल थीं। |
| परगना | राज्य परगनों में बँटा था और परगना अधिकारी शांति-व्यवस्था बनाए रखता था। मारवाड़ में परगने का प्रमुख हाकिम होता था, जिसकी सहायता के लिए नायब हाकिम और कानूनगो थे। जयपुर में परगने का सर्वोच्च अधिकारी आमिल था: वह राजस्व वसूल करता और उसके अभिलेख रखता था, और अमीन, कानूनगो, पटेल व पटवारी उसके सहायक थे। |
| गाँव | गाँव सबसे छोटी इकाई था। पटवारी भूमि के कागज रखता और राजस्व वसूल करता था; चौकीदार उसकी सहायता करते थे। मुखिया और गाँव के सयाने लोगों की ग्राम पंचायत झगड़े और स्थानीय मामले निपटाती थी, और उसके साथ जाति पंचायत भी काम करती थी। |
भूमि: किसके पास
भूमि खालसा, हवाला, जागीर, भोम और सासन में बँटी थी, और प्रत्येक से मिलने वाला राजस्व राज्य-दर-राज्य भिन्न था।
| प्रकार | अर्थ |
|---|---|
| खालसा | राज्य की अपनी भूमि, जिसका राजस्व-प्रबंध राज्य सीधे करता था; किसान राजस्व सीधे राज्य को देता था। |
| हवाला | भूमि जिसकी देखरेख हवलदार करते थे। |
| जागीर | सेवा के बदले दी गई भूमि; उसका स्वामी जागीरदार भूमि का राजस्व लेता और बदले में सेवा देता था। |
| भोम | भोमिया की भूमि, जो राज्य की सेवा के बदले मिलती थी: गाँवों और मार्गों की रखवाली तथा राजकोष को सुरक्षित पहुँचाना; रीमा हूजा बुलाने पर सैनिक सेवा भी बताती हैं। |
| सासन | मंदिर, मठ, चारण और ब्राह्मणों को दिए गए धर्मार्थ अनुदान, जिनके बदले सेवा अपेक्षित नहीं थी; इन्हें मुआफी भी कहते थे। |
- बपौती: वह भूमि, जिस पर उसे जोतने वाले किसान का अधिकार होता था। मेवाड़ के खालसा गाँवों में ऐसी भूमि का धारक राजस्व चुकाते रहने तक उसे बेच, गिरवी रख और विरासत में दे सकता था।
राजस्व वसूली की पद्धतियाँ
राजस्व अनाज या नकद में लिया जाता था, और पद्धति राज्य-दर-राज्य, यहाँ तक कि जागीर-दर-जागीर बदल जाती थी।
| पद्धति | कैसे चलती थी |
|---|---|
| बटाई | फसल का बँटवारा: उपज को वास्तव में बाँट लिया जाता था। |
| कूंत | खड़ी फसल के अनुमान पर हिस्सा तय किया जाता था। |
| लाटा (लाटाई) | फसल कटने और गहाई के बाद अनाज को तौला जाता था और तौल के आधार पर राज्य का हिस्सा अनाज के रूप में लिया जाता था। |
| ज़ब्ती (जप्ती) | भूमि की नाप कर उसका निर्धारण किया जाता था। |
| मुकाता | नकद या अनाज में निश्चित राशि; भूमि मुकाते पर भी दी जाती थी। |
| बीगोड़ी | अफीम, कपास, गन्ने जैसी कीमती फसलों पर बीघे के हिसाब से नकद दर। |
भू-राजस्व के ऊपर लगने वाले कर
भू-राजस्व के अतिरिक्त राज्य और उनके जागीरदार अनेक कर लेते थे।
- लाग-बाग: जागीरदारों द्वारा अपनी जनता से लिए जाने वाले कर और बेगार (बिना मजदूरी के बलपूर्वक करवाया जाने वाला काम)।
- घासमारी: चरागाह के उपयोग पर लगने वाला कर।
- सवारखर्च: घुड़सवार सेना के निर्वाह के लिए कर।
- चूल्हा-बराड: घरों पर लगने वाला कर।
- चंवरी: जागीरदार द्वारा बेटी की शादी पर लिया जाने वाला कर; बिजौलिया का चंवरी कर किसान आंदोलनों के पृष्ठ पर है।
जागीर, जागीरदार और मुगल मनसब
- जागीरदारी: शासक अपने छोटे भाइयों और अन्य बंधु-बांधवों को जीविका के लिए भूमि देता था; यह व्यवस्था रक्त-संबंध और कुलीय भावना पर आधारित थी, और बाद में योग्यता के आधार पर भी जागीरें दी जाने लगीं। इसका आरंभ कब हुआ, यह निश्चित नहीं है; राजपूत शासन में इसका स्पष्ट रूप विकसित हुआ।
- जागीरदार को अपनी भूमि के राजस्व का अधिकार था और उसे उसकी रक्षा करनी, उसका शासन चलाना और बुलाने पर सैनिक सेवा देनी होती थी। जागीर में उसके प्रशासनिक और न्यायिक अधिकार थे, जिनमें कर लगाने का अधिकार भी था। अधिकारों का अतिक्रमण करने पर जागीर जब्त या कम की जा सकती थी।
- जागीर पट्टा: शासक द्वारा दी गई जागीर का उल्लेख करने वाला पत्र। मारवाड़ में मोटा राजा उदयसिंह के समय से जागीरदार की मृत्यु पर जागीर समाप्त मानी जाती थी, और उत्तराधिकारी पेशकश नामक शुल्क देकर पट्टा नवीनीकृत करवाता था; इसे बाद में हुक्मनामा कहा गया।
- रेख: जागीरदार द्वारा राज्य को दिया जाने वाला वार्षिक भुगतान, जो राज्य द्वारा आँकी गई जागीर की आय के आधार पर तय होता था।
- मुगल काल में: मुगलों से संधि के बाद शासक मनसबदार बन गए और जागीरदारों पर उनकी निर्भरता घटी; वे जागीरदारों से भाई की जगह स्वामी जैसा व्यवहार करने लगे। युद्ध और शांति की सेवा के साथ एक निश्चित कर भी तय हुआ, जिसका उल्लेख जागीर पट्टे में होता था।
- मनसब और जागीर: मनसब मुगल पद था, और अधिकांश मनसबदारों को ऐसी जागीर से वेतन मिलता था जिसकी अनुमानित आय उनके वेतन के बराबर होती थी। राजपूत शासक की पैतृक भूमि उसकी वतन जागीर मानी जाती थी, जो उसके वेतन में गिनी जाती थी; शेष वेतन के बदले मिली जागीर तनख्वाह जागीर कहलाती थी।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- प्रधान या दीवानमारवाड़ में शासक के बाद प्रधान और उसके बाद दीवान आता था · जिस राज्य में प्रधान नहीं होता था, वहाँ दीवान सर्वोच्च अधिकारी था।
- भोमिया का करजी.एन. शर्मा के अनुसार भोम की भूमि पर कोई कर नहीं लगता था · रीमा हूजा के अनुसार भोमिया कभी-कभी भोम-बराड नाम का छोटा कर देते थे · भीलवाड़ा गजेटियर के अनुसार मेवाड़ के भोमिया नाममात्र का भोम-बराड देते थे।
- राज्य का हिस्सासामान्यतः उपज का एक-तिहाई या एक-चौथाई · उन्नीसवीं सदी में मेवाड़ में एक-चौथाई से आधा, और उसी सदी के अंत में मारवाड़ की खालसा भूमि पर एक-पाँचवाँ से एक-तिहाई; ये अलग-अलग समय और राज्यों के आँकड़े हैं, मतभेद नहीं।
- मारवाड़ के परगनेजी.एन. शर्मा: मोटा राजा उदयसिंह के समय 6, अजीतसिंह के समय 21 · रीमा हूजा: उदयसिंह-सूरसिंह की सुधरी व्यवस्था में 23, प्रत्येक एक हाकिम के अधीन।
खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
संरक्षण अधिकारी 2022 · प्रश्न 124
मध्यकालीन मारवाड़ में शासक के बाद सर्वोच्च अधिकारी कौन था ?
- (1)दीवान
- (2)प्रधान
- (3)मुसाहिब
- (4)अमात्य
उत्तर देखें
✓ (2) प्रधान
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसंरक्षण अधिकारी 2022 · प्रश्न 127
लाटा अथवा लाटाई क्या था ?
- (1)भू-राजस्व व्यवस्था, जिसमें भुगतान नकद होता था।
- (2)भू-राजस्व व्यवस्था, जिसमें भुगतान फसल के रूप में होता था।
- (3)राज्य द्वारा ली जाने वाली एक प्रकार की बेगार।
- (4)सामंत द्वारा अधिरोपित एक प्रकार का उपकर।
उत्तर देखें
✓ (2) भू-राजस्व व्यवस्था, जिसमें भुगतान फसल के रूप में होता था।
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसंरक्षण अधिकारी 2024 · प्रश्न 3
मध्ययुगीन राजस्थान में 'पंचकुल संस्था' संबंधित थी –
- (1)केन्द्रीय प्रशासन से
- (2)सैन्य विभाग से
- (3)स्थानीय प्रशासन से
- (4)धार्मिक संस्था से
उत्तर देखें
✓ (3) स्थानीय प्रशासन से
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसंरक्षण अधिकारी 2024 · प्रश्न 20
मध्यकालीन राजस्थान में 'उद्रंग' शब्द निम्न में से किससे संबंधित था?
- (1)एक प्रकार का दण्ड
- (2)एक प्रकार का दान
- (3)माप की इकाई
- (4)उपज पर कर
उत्तर देखें
✓ (4) उपज पर कर
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