एक नज़र में
- टॉड की 'एनल्स एण्ड एण्टीक्वीटीज़ ऑफ राजस्थान' (1829 ई.) में इस प्रदेश का नाम 'रायथान' या 'राजस्थान' रखा गया; कविराज श्यामलदास का 'वीर विनोद' मेवाड़ का इतिहास है।
- आरंभिक तिथियुक्त लेखों में यूप हैं, यानी वैदिक यज्ञों के स्तंभ, जिन पर कृत संवत् की तिथि है: नांदसा, बरनाला, बड़वा और बिजयगढ़।
- 18वीं सदी से रियासतों ने मुगल बादशाह (प्रायः शाहआलम) के नाम पर अपने चिह्न सहित रुपये ढाले; बाद में अंग्रेज़ी कलदार रुपये ने इनकी जगह ले ली।
- राजस्थान राज्य अभिलेखागार का मुख्यालय बीकानेर में है; यह 1955–56 में अभिलेख विभाग के रूप में शुरू हुआ, और इसके अभिलेख अकबर के शासनकाल तक जाते हैं।
स्रोतों के प्रकार
| प्रकार | क्या मिलता है | उदाहरण |
|---|---|---|
| पुरातात्त्विक | शिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्के, स्मारक और उत्खनित स्थल | उत्खनित स्थल प्राचीन सभ्यताओं वाले पृष्ठ पर हैं |
| मुद्राशास्त्रीय | प्राचीन गणों, गुप्तों, प्रतिहारों और राजपूत राज्यों के सिक्के | बयाना निधि, झाड़शाही, अखयशाही |
| साहित्यिक | काव्य, तथा गद्य में ख्यातें और विगत | नैणसी री ख्यात, दयालदास री ख्यात, वंश भास्कर |
| फारसी इतिहास | सल्तनत और मुगल दरबारों में लिखे इतिहास | ताजुल मआसिर, बाबरनामा, अकबरनामा |
| अभिलेखीय (पुरालेख) | रियासतों की बहियाँ, फरमान, पट्टे, परवाने और पत्र | राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर |
शिलालेख
शिलालेख चट्टानों, स्तंभों तथा मंदिरों, बावड़ियों और तालाबों की दीवारों पर खुदे मिलते हैं। कई में शासक की प्रशंसा और उसकी वंशावली होती है; इन्हें प्रशस्ति कहते हैं। मध्यकालीन लेख अधिकतर संस्कृत या स्थानीय बोली में और नागरी लिपि में हैं।
| अभिलेख | तिथि | स्थान, भाषा, लिपि | क्या अंकित है |
|---|---|---|---|
| बड़ली | वर्ष 84; जी.एच. ओझा ने इसे वीर (महावीर) संवत् का 84वाँ वर्ष, यानी 443 ई.पू. माना, जबकि ए.एच. दानी और डी.सी. सरकार अक्षरों की बनावट के आधार पर इसे ई.पू. पहली शताब्दी का मानते हैं | बड़ली गाँव, अजमेर के पास; ब्राह्मी लिपि में प्राकृत; अब अजमेर संग्रहालय में | भगवान वीर (महावीर) को समर्पित एक खंडित लेख |
| घोसुंडी | ई.पू. दूसरी शताब्दी (जी.एन. शर्मा); ई.पू. पहली शताब्दी के उत्तरार्ध से पहले नहीं (ए.एच. दानी) | घोसुंडी गाँव, नगरी के पास, चित्तौड़गढ़ से लगभग सात मील; ब्राह्मी लिपि में संस्कृत; टुकड़ों में मिला, एक बड़ा टुकड़ा उदयपुर संग्रहालय में | संकर्षण और वासुदेव के पूजा-स्थल के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी; गजायन गोत्र के सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ |
| नांदसा यूप | कृत संवत् 282 (लगभग 225 ई.) | नांदसा, भीलवाड़ा जिला, भीलवाड़ा नगर से लगभग 36 मील (गंगापुर के पास, भीलवाड़ा के पश्चिम में); तालाब के तल में लगभग 12 फुट ऊँचा स्तंभ | एक सत्र (वैदिक यज्ञ); स्तंभ सोम ने स्थापित किया |
| बरनाला यूप | कृत संवत् 284 (227 ई.) और कृत संवत् 335 (278 ई.) | बरनाला, पूर्व जयपुर रियासत में; अब आमेर संग्रहालय में | वैदिक यज्ञों के दो यूप |
| बड़वा यूप | कृत संवत् 295 (238–39 ई.) | बड़वा, बारां जिला (पूर्व कोटा रियासत में); मौखरियों के तीन स्तंभ | तीन भाइयों बलवर्धन, सोमदेव और बलसिंह द्वारा किए यज्ञ |
| बिजयगढ़ (बयाना) यूप | कृत (मालव–विक्रम) संवत् 428 (371–72 ई.) | बिजयगढ़ दुर्ग, बयाना, भरतपुर; संस्कृत | यशोवर्धन के पुत्र विष्णुवर्धन ने पुंडरीक यज्ञ में स्तंभ स्थापित किया |
| कणसवा | वि.सं. 795 (738 ई.) | कणसवा गाँव, कोटा के पास; शिव मंदिर में | मौर्य राजा धवल का नाम; उसके सामंत शिवगण के मंदिर का उल्लेख |
| हर्ष (हर्षनाथ) | वि.सं. 1030 आषाढ़ सुदि 15 (973 ई.) | हर्ष पर्वत पर हर्षनाथ मंदिर, सीकर के पास; संस्कृत, 48 श्लोक | विग्रहराज द्वितीय तक शाकंभरी के चौहानों की वंशावली; यह उसी के शासन में खुदा; मंदिर अल्लट ने बनवाया |
| अभिलेख | तिथि | स्थान, भाषा, लिपि | क्या अंकित है |
|---|---|---|---|
| सुंधा पर्वत प्रशस्ति | वि.सं. 1319 वैशाख (1262 ई.) | सुंधा पर्वत (सुगंधाद्रि), जसवंतपुरा से लगभग 10 मील, जालौर जिला; देवनागरी में संस्कृत, दो शिलाओं पर 59 श्लोक | जालौर के चौहान चाचिगदेव और उसके पूर्वजों की प्रशंसा; रचयिता जैन साधु जयमंगलाचार्य, उत्कीर्णक सूत्रधार जेसा |
| चीरवा | वि.सं. 1330 कार्तिक सुदि 1 (1273 ई.) | चीरवा गाँव, उदयपुर से लगभग 8 मील उत्तर, वहीं एक मंदिर के द्वार पर; नागरी में संस्कृत, 36 पंक्तियाँ, 51 श्लोक | गुहिल शासक पद्मसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिंह और समरसिंह; तलारक्ष अधिकारी। रचयिता रत्नप्रभसूरि, लेखक पार्श्वचंद्र, उत्कीर्णक केलिसिंह |
| समाधीश्वर मंदिर | वि.सं. 1485 (1428 ई.) | समाधीश्वर मंदिर, चित्तौड़गढ़ दुर्ग; सभामंडप की पूर्वी दीवार में काले पत्थर की शिला, 43 पंक्तियाँ, 75 श्लोक | मोकल तक की गुहिल वंशावली और चित्तौड़ में मोकल के निर्माण-कार्य; रचयिता विष्णुभट्ट का पुत्र एकनाथ, उत्कीर्णक वीसल |
| कुंभलगढ़ शिलालेख | वि.सं. 1517 मार्गशीर्ष वदि 5 (1460 ई.) | कुंभलगढ़ के मामादेव (कुंभश्याम) मंदिर से; पाँच शिलाओं में से पहली, तीसरी, चौथी और दूसरी का एक टुकड़ा उदयपुर संग्रहालय में, पाँचवीं अप्राप्य; नागरी में संस्कृत | कुंभा तक के मेवाड़ शासक, साथ में मेवाड़ और चित्तौड़ का वर्णन। रचयिता अनिश्चित: जी.एच. ओझा के अनुसार महेश, जी.एन. शर्मा के अनुसार संभवतः कान्ह व्यास |
अन्यत्र: बिजौलिया अभिलेख (1170 ई.) चौहान वाले पृष्ठ पर; बाउक का जोधपुर अभिलेख (837 ई.) और कक्कुक के घटियाला अभिलेख अन्य राजवंशों वाले पृष्ठ पर; कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति मेवाड़ वाले पृष्ठ पर; राजसमंद की राजप्रशस्ति मंदिरों वाले पृष्ठ पर।
ताम्रपत्र
ताम्रपत्र या दानपत्र किसी दान का लेख है: दाता और प्राप्तकर्ता, अवसर, पड़ोसी खेतों सहित भूमि और साक्षी। इनसे भूमि, फसलों और तिथियों पर प्रकाश पड़ता है। मेवाड़ के दानपत्र प्रायः 'श्री एकलिंगजी प्रसादात' से आरंभ होते हैं (खेरोदा ऐसे ही; नादिया और करेड़ा 'राणा श्री कुंभा आदेशात्' से); कुंभा के ताम्रपत्र भूमि हल में नापते हैं।
| ताम्रपत्र | तिथि | शासक | क्या अंकित है |
|---|---|---|---|
| खेरोदा | वि.सं. 1494 माघ सुदि 11, गुरुवार (1437 ई.) | कुंभा | एकलिंगजी में कुंभा के प्रायश्चित के बाद उपाध्याय जोशी जाना को खेरोदा में दस हल भूमि; 400 टके भी दिए गए |
| नादिया (सिरोही) | वि.सं. 1494 आषाढ़ वदि (1437 ई.) | कुंभा | अजाहरी परगने में भूमि का दान; इससे लगता है कि तब तक आबू क्षेत्र कुंभा के अधीन था; अब राजपूताना संग्रहालय, अजमेर में |
| करेड़ा | वि.सं. 1517 पोष सुदि 15 (1460 ई.) | कुंभा | चंद्रपर्व पर करेड़ा में तीन हल भूमि का दान |
सिक्के
सिक्कों से शासकों के नाम और वंश, राज्यों की सीमा और उनकी आर्थिक दशा का पता चलता है। प्रतिहारों के आदिवराह सिक्के अन्य राजवंशों वाले पृष्ठ पर; चौहानों के सिक्के (अजयराज, सोमलदेवी) चौहान वाले पृष्ठ पर।
| सिक्का या निधि | कहाँ मिला | क्या दर्शाता है |
|---|---|---|
| आहत (पंचमार्क) चाँदी के सिक्के | रैढ़, टोंक, 1938–40 के उत्खनन में | के.एन. पुरी की रिपोर्ट में 3,075 (जी.एन. शर्मा के अनुसार 3,074); सूर्य, तीर, मछली, घंटा, पौधा या पशु जैसे चिह्नों के ठप्पे वाले चाँदी के टुकड़े |
| मालव सिक्के | रैढ़; नगर, उणियारा के पास (टोंक) में हज़ारों | कुछ पर 'मालवानां जयः' (मालवों की जय) लिखा है; रैढ़ में मालव गण की सीसे की मुहर के साथ ये उसे मालवों का केंद्र बताते हैं |
| गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्के | बयाना के पास, भरतपुर | गुप्तों के सोने के सिक्कों की निधि, जिसकी सूची ए.एस. अल्तेकर ने बनाई |
| गधिया सिक्के | मेवाड़, मारवाड़ और अन्यत्र | धुँधली आकृति वाले घटिया चाँदी और ताँबे के सिक्के। वेब इन्हें ससैनियन (फारसी) सिक्कों से निकला मानते हैं; जी.एन. शर्मा के अनुसार ये फारसी नहीं, क्षत्रप और प्रतिहार सिक्कों के चिह्नों का पतला रूप हैं |
| राज्य | सिक्का | विवरण |
|---|---|---|
| मेवाड़ | चित्तौड़ी, भिलाड़ी और उदयपुरी रुपये; स्वरूपशाही; चाँदोड़ी; ढींगला, भिलाड़ी, त्रिशूलिया, भींडरिया और नाथद्वारिया ताँबे के पैसे | चाँदोड़ी रुपया महाराणा भीमसिंह ने चलाया, जिसका नाम उनकी बहन चंद्रकुँवर पर पड़ा; बाद में स्वरूपसिंह ने इन्हें गलवाकर नए चाँदोड़ी सिक्के जारी किए |
| मारवाड़ | विजयशाही; लल्लूलिया और रुररिया रुपये; भीमशाही ताँबा | विजयसिंह ने 1761 में टकसाल खोली; जोधपुर, नागौर, पाली और सोजत में टकसालें; लल्लूलिया रुपया सोजत की टकसाल का था |
| बीकानेर | मुगल बादशाह के नाम के रुपये | टकसाल महाराजा गजसिंह के समय बादशाह की सनद मिलने के बाद खुली |
| जयपुर | झाड़शाही | छह टहनियों वाले झाड़ का चिह्न |
| जैसलमेर | अखयशाही चाँदी | टकसाल 1756 में महारावल अखैसिंह ने स्थापित की |
| प्रतापगढ़ | सालिमशाही चाँदी | 1784 से सालिमसिंह के समय से ढला; डूंगरपुर, बाँसवाड़ा और मालवा में भी चलता था |
| धौलपुर | तमंचाशाही | चिह्न तमंचा (पिस्तौल); टकसाल 1804 में खुली |
| झालावाड़ | मदनशाही | पुरानी मदनशाही 1837 से 1857 तक ढली, नई 1857 के बाद |
साहित्यिक स्रोत
चौहानों पर ग्रंथ (पृथ्वीराज विजय, पृथ्वीराज रासो, हम्मीर महाकाव्य, कान्हड़दे प्रबंध) चौहान वाले पृष्ठ पर और कुवलयमाला भाषा और साहित्य वाले पृष्ठ पर है। ख्यात, वात और विगत विधाएँ भाषा और साहित्य वाले पृष्ठ पर समझाई गई हैं।
| ग्रंथ | रचयिता | किसका स्रोत |
|---|---|---|
| मुहणोत नैणसी री ख्यात | मुहणोत नैणसी, मारवाड़ के जसवंतसिंह के दीवान | मारवाड़, बीकानेर, उदयपुर, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, किशनगढ़, आमेर, बूँदी, सिरोही आदि राज्यों का इतिहास, और ऐसी खाँपों की वंशावलियाँ जो अन्यत्र कम मिलती हैं |
| मारवाड़ रा परगनां री विगत | मुहणोत नैणसी | मारवाड़ के प्रत्येक परगने का इतिहास, आबादी, भूमि की किस्में, फसलें और सिंचाई के साधन |
| दयालदास री ख्यात | दयालदास, बीकानेर के चारण, महाराजा रत्नसिंह, सरदारसिंह और डूंगरसिंह के विश्वासपात्र | राव बीका से बीकानेर का इतिहास: RBSE की पुस्तक के अनुसार महाराजा अनूपसिंह तक, जी.एन. शर्मा के अनुसार महाराजा सरदारसिंह के राज्यारोहण तक; वंशावलियों, पट्टों, परवानों, बहियों और फरमानों पर आधारित |
| वंश भास्कर | बूँदी के सूर्यमल्ल मीसण | बूँदी का विस्तृत और अन्य राज्यों का संक्षिप्त इतिहास, टॉड के बाद लिखा गया; पुराने अंश भाटों की कथाओं पर आधारित, लेखक के समय के निकट आते-आते अधिक विश्वसनीय |
| सूरज प्रकास | करणीदान कविया, मारवाड़ के अभयसिंह के दरबारी कवि | अभयसिंह के युद्धों का आँखों देखा वर्णन और उस समय का समाज |
| फारसी ग्रंथ | रचयिता | क्या देता है |
|---|---|---|
| ताजुल मआसिर | हसन निज़ामी | पहले मुस्लिम आक्रमणों का क्रम |
| तबकात-ए-नासिरी | मिनहाजुद्दीन | नागौर, जालौर और अजमेर में मुस्लिम सत्ता का फैलना |
| ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह (तारीख-ए-अलाई) | अमीर खुसरो | अलाउद्दीन के चित्तौड़ और रणथम्भौर पर आक्रमण |
| बाबरनामा | बाबर | खानवा का युद्ध |
| अकबरनामा और आइने अकबरी | अबुल फज़ल | अकबर का विरोध करने या उससे संधि करने वाले राजस्थानी शासक; उपज, सेना और समाज |
| मआसिरुल उमरा | शाहनवाज़ खाँ (उसके पुत्र अब्दुल हई ने पूरा किया) | मुगलों की सेवा करने वाले अनेक राजस्थानी राजाओं, राजकुमारों और सामंतों की जीवनियाँ |
अभिलेखीय स्रोत: राजस्थान राज्य अभिलेखागार
| विलय | 1 जुलाई 1960 से पुरानी रियासतों के यूनिट रिकॉर्ड कार्यालय इसमें मिलाकर राजस्थान राज्य अभिलेखागार बना, उस समय 20 जिला अभिलेख कार्यालयों सहित |
|---|---|
| संग्रह | मुगलकालीन फारसी फरमान, निशान, मंसूर, अखबारात और वकील रिपोर्ट, तथा रियासतों की बहियाँ, पट्टे और परवाने |
| दर्शकों के लिए | अभिलेखागार का संग्रहालय, जिसमें महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ और ताम्रपत्र दिखाए जाते हैं |
| अभिलेख | क्या है | क्या बताता है |
|---|---|---|
| फरमान, निशान | मुगल दरबार से राजस्थान के शासकों को भेजे फारसी आदेश | जयपुर का संग्रह जहाँगीर से बहादुरशाह तक का है |
| सनद | बादशाहों के अनुदान-पत्र | जयपुर के शासकों को जागीर में दिए गए परगने |
| अखबारात और वकील रिपोर्ट | मुगल दरबार से समाचार-पत्र और वकीलों के प्रतिवेदन | दरबार की रोज़ की घटनाएँ; जयपुर की वकील रिपोर्टें मुगल–कछवाहा और मुगल–मराठा संबंधों पर प्रकाश डालती हैं |
| खरीता | शासकों के बीच पत्र | राज्य के मुगलों, मराठों और पड़ोसियों से संबंध; खरीता बहियों में इनकी प्रतिलिपियाँ हैं |
| पट्टा और परवाना | राज्य के अनुदान-पत्र और आदेश | पट्टा बहियों में राज्य द्वारा दिए पट्टों की प्रतिलिपियाँ हैं |
| बही | हिसाब और नकल किए दस्तावेज़ों की जिल्दबंद पुस्तकें | जोधपुर में हकीकत, ब्याव (विवाह), खरीता और पट्टा बहियाँ रखी जाती थीं |
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- बड़ली या घोसुंडीअजमेर के पास का बड़ली लेख भगवान वीर को समर्पित जैन लेख है · नगरी (चित्तौड़गढ़) के पास का घोसुंडी लेख संकर्षण और वासुदेव का वैष्णव लेख है।
- यूप या प्रशस्तियूप यज्ञ का स्तंभ है (नांदसा, बरनाला, बड़वा, बिजयगढ़) · प्रशस्ति शासक और उसके वंश की प्रशंसा है (सुंधा पर्वत, चीरवा, कुंभलगढ़)।
खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
समान पात्रता परीक्षा (स्नातक स्तर) 2022 · प्रश्न 30
निम्न में से कौन–सा युग्म सुमेलित नहीं है?
- (1)हम्मीर महाकाव्य – नयनचन्द्र सूरी
- (2)वंश भास्कर – सूर्यमल्ल मीसण
- (3)कुवलयमाला – उद्योतन सूरी
- (4)पृथ्वीराज विजय – चन्दबरदाई
उत्तर देखें
✓ (4) पृथ्वीराज विजय – चन्दबरदाई
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसंरक्षण अधिकारी 2022 · प्रश्न 123
निम्नलिखित में से कौन सा अभिलेख शाकम्भरी चौहानों के प्रारंभिक इतिहास का अच्छा स्रोत है ?
- (1)चीरवा अभिलेख
- (2)बिजोलिया अभिलेख
- (3)घटियाला अभिलेख
- (4)मानमोरी अभिलेख
उत्तर देखें
✓ (2) बिजोलिया अभिलेख
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