एक नज़र में
- बारह कोटड़ी (प्रश्नपत्र में 'बारह कोठरी'): कछवाहों के बारह प्रमुख सामंत घराने, नौ पृथ्वीराज के पुत्रों से और तीन पुरानी शाखाओं से; आरपीएससी की उत्तर कुंजी (संरक्षण अधिकारी 2024) इसे आमेर से जोड़ती है।
- मुगल अधीनता स्वीकार करने वाले पहले राजपूत शासक: भारमल, 1562।
- राजधानियाँ: दौसा, फिर जमवारामगढ़, फिर आमेर, फिर जयपुर।
- कुलदेवी: जमवाय माता, जमवारामगढ़ में।
उत्पत्ति और आमेर
- कछवाहे स्वयं को राम के पुत्र कुश का वंशज मानते हैं।
- दूल्हेराय (दुलहराय) ने बड़गूजरों को हराकर ढूँढाड़ में कछवाहा राज्य स्थापित किया। उन्होंने मीणों से माँच लिया, उसका नाम रामगढ़ (जमवारामगढ़) रखा और उसे राजधानी बनाया।
- दूल्हेराय के उत्तराधिकारी कोकिलदेव (काकिल) ने मीणों से आमेर लिया।
- तिथियाँ अलग-अलग हैं: आरबीएसई पुस्तक दूल्हेराय के नए राज्य के लिए 1137 ई. और कोकिलदेव के आमेर लेने के लिए 1207 ई. देती है; जदुनाथ सरकार काकिल का उत्तराधिकार लगभग 1070 ई. में रखते हैं और वंश की ख्यातों की तिथियों को विश्वसनीय नहीं मानते।
आमेर और जयपुर के शासक
- पृथ्वीराजबारह कोटड़ीशासनकाल1503–1527 ई.प्रसिद्धराणा सांगा के सामंत; खानवा (1527) में बाबर से लड़े
- भारमलमुगल संधिशासनकाल1547 या 1548 से 1573 या 1574 ई.प्रसिद्धपृथ्वीराज के पुत्र; 1562 से अकबर के सहयोगी
- भगवंतदास (भगवानदास)मानसिंह के पिताशासनकाल1573 या 1574 से 1589 ई.प्रसिद्धभारमल के ज्येष्ठ पुत्र; सरनाल (1572) में अकबर की ओर से लड़े
- मानसिंह प्रथमअकबर के सेनापतिशासनकाल1589–1614 ई.प्रसिद्धहल्दीघाटी 1576; काबुल, बिहार और बंगाल के सूबेदारपूरे नोट्स पढ़ें →
- भाऊसिंहमानसिंह के छोटे पुत्रशासनकाल1614–1621 ई.
- मिर्जा राजा जयसिंह प्रथमपुरंदर 1665शासनकाल1621–1667 ई.
- सवाई जयसिंह द्वितीयजंतर मंतरशासनकाल1700–1743 ई. (कुछ विवरणों में 1699)प्रसिद्ध1727 में जयपुर बसाया; पाँच वेधशालाएँपूरे नोट्स पढ़ें →
- ईश्वरीसिंहराजमहल 1747शासनकाल1743–1750 ई.
- माधोसिंह प्रथमसवाई माधोपुरशासनकाल1750 या 1751 से 1768 ई.
- सवाई प्रतापसिंहतूंगा 1787शासनकाल1778–1803 ई.प्रसिद्धहवामहल, 1799: मंदिरों और महलों के नोट्स देखें
दोनों जयसिंहों के बीच रामसिंह प्रथम (1667–1688 ई.) और बिशनसिंह (1688–1699 ई.) शासक रहे; बिशनसिंह सवाई जयसिंह द्वितीय के पिता थे। माधोसिंह प्रथम के बाद उनके पुत्र पृथ्वीसिंह द्वितीय (1768–1778 ई.) आए, जो प्रतापसिंह के बड़े भाई थे।
भारमल और मुगलों से संधि
- जनवरी 1562: भारमल अकबर की अजमेर यात्रा के समय सांगानेर में उनसे मिले।
- फरवरी 1562: अकबर के लौटते समय भारमल की पुत्री हरखाबाई, जो बाद में मरियम-उज़-ज़मानी कहलाईं, का विवाह सांभर में अकबर से हुआ; वे जहाँगीर की माता थीं।
- इसके बाद उनके पुत्र भगवंतदास और पौत्र मानसिंह अकबर की सेवा में आए।
- अकबर की राजपूत नीति और आमेर के बाद साथ आए घराने: 'राजपूत, सल्तनत और मुगल' के नोट्स देखें।
मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम
| शासनकाल | 1621–1667 ई.; दस या ग्यारह वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठे |
|---|---|
| परिवार | महासिंह के पुत्र; अपने दादा के भाई भाऊसिंह के बाद शासक बने |
| सेवा | जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगज़ेब |
| मिर्जा राजा की उपाधि | शाहजहाँ ने दी: आरबीएसई पुस्तक में 1637, जदुनाथ सरकार में 20 अप्रैल 1639 |
| पुरंदर की संधि | 11 जून 1665, शिवाजी से, पुरंदर किले की घेराबंदी के बाद: 23 किले मुगलों को मिले और 12 शिवाजी के पास रहे |
| मृत्यु | 28 अगस्त 1667, बुरहानपुर में; उनके पुत्र रामसिंह प्रथम उत्तराधिकारी बने |
| दरबारी कवि | बिहारी, जिन्होंने लगभग 700 दोहों की सतसई रची |
ईश्वरीसिंह और माधोसिंह प्रथम
| घटना | तिथि | क्या हुआ |
|---|---|---|
| दावा | 1743 | सवाई जयसिंह द्वितीय की मृत्यु पर उनके पुत्र ईश्वरीसिंह गद्दी पर बैठे। मेवाड़ की राजकुमारी से जन्मे जयसिंह के पुत्र माधोसिंह ने 1708 के उस समझौते के आधार पर दावा किया कि ऐसा पुत्र ही उत्तराधिकारी होगा; महाराणा जगतसिंह द्वितीय उनके समर्थक थे |
| राजमहल | 1–2 मार्च 1747 | ईश्वरीसिंह की सेना ने माधोसिंह और उनके सहयोगियों, मेवाड़, कोटा, बूँदी के उम्मेदसिंह और होल्कर के मराठों, को हराया। राजमहल बनास के किनारे, देवली के पास है |
| बगरू | अगस्त 1748 | माधोसिंह होल्कर के मराठों और बूँदी के साथ फिर आए। छह दिन की लड़ाई के बाद ईश्वरीसिंह ने उन्हें पाँच परगने देना और बूँदी उम्मेदसिंह को सौंपना स्वीकार किया |
| ईश्वरीसिंह की मृत्यु | 12 दिसंबर 1750 | होल्कर की सेना के जयपुर के पास पहुँचने पर उन्होंने आत्महत्या की, और माधोसिंह शासक बने |
- 1763: माधोसिंह प्रथम ने सवाई माधोपुर बसाया। 1768 में उनकी मृत्यु हुई।
सवाई प्रतापसिंह
| शासनकाल | 1778–1803 ई.; बड़े भाई पृथ्वीसिंह द्वितीय के बाद आए; दोनों माधोसिंह प्रथम के पुत्र थे |
|---|---|
| तूंगा, 28 जुलाई 1787 | जयपुर और मारवाड़ बनाम महादजी सिंधिया; इसे लालसोट का युद्ध भी कहते हैं। मैदान में कोई पक्ष नहीं जीता; राजपूतों ने इसे अपनी विजय कहा, पर महादजी का अभियान विफल रहा और वे लौट गए |
| उपनाम | कवि के रूप में बृजनिधि |
| चित्रकला | इनके समय की जयपुर शैली: चित्रशैलियों के नोट्स देखें |
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- दो जयसिंहमिर्जा राजा जयसिंह प्रथम (1621–1667), पुरंदर की संधि 1665 · सवाई जयसिंह द्वितीय (1700–1743), जयपुर की स्थापना 1727।
- मिर्जा राजाअकबर ने यह उपाधि मानसिंह प्रथम को दी · जहाँगीर ने भाऊसिंह को · शाहजहाँ ने जयसिंह प्रथम को।
- तीन मानसिंहआमेर के मानसिंह प्रथम, अकबर के सेनापति (1589–1614) · जयपुर के सवाई मानसिंह द्वितीय, राजस्थान के पहले राजप्रमुख · जोधपुर के महाराजा मानसिंह, महामंदिर (1812)।
- राजमहल या बगरूराजमहल 1747, ईश्वरीसिंह की विजय · बगरू 1748, माधोसिंह को पाँच परगने।
खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
संरक्षण अधिकारी 2024 · प्रश्न 1
'बारह कोठरी' निम्नलिखित में से किस राज्य से संबंधित है?
- (1)अजमेर
- (2)मेवाड़
- (3)आमेर
- (4)भीनमाल
उत्तर देखें
✓ (3) आमेर
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