एक नज़र में
- शैली और चित्रकार: साहिबदीन, मनोहर और निसारदीन · मेवाड़; अमरदास भाटी, दाना भाटी और शिवदास · जोधपुर; अली रज़ा और हामिद रुकनुद्दीन · बीकानेर; निहालचंद · किशनगढ़; साहिबराम · जयपुर; अहमदअली · बूंदी; रघुनाथ · कोटा।
- स्वर्णकाल: मेवाड़ में जगतसिंह प्रथम · मारवाड़ में मानसिंह · बीकानेर में अनूपसिंह · किशनगढ़ में सावंतसिंह · जयपुर में सवाई प्रतापसिंह · अलवर में विनयसिंह · बूंदी में छत्रसाल · कोटा में उम्मेदसिंह।
- नाम: आनन्द कुमारस्वामी की 'राजपूत पेंटिंग्स' (1916 ई.) ने पहला वैज्ञानिक विभाजन प्रस्तुत किया और इसे 'राजपूत चित्रकला' कहा; रायकृष्णदास ने इसका खंडन कर 'राजस्थानी चित्रकला' नाम दिया।
चार शैलियाँ और किशनगढ़
- मेवाड़प्रारंभिक एवं मौलिक रूपउपशैलियाँचावंड, उदयपुर, नाथद्वारा, देवगढ़, सावर, शाहपुरा; बनेड़ा, बागौर, बेगूँ, केलवा ठिकाणा कलापहचानगठीली मूँछों वाले पुरुष, बड़े नयन, स्त्रियों की मीनाकृत आँखें; लाल, पीला, हरा, नीला, सफेदपूरे नोट्स पढ़ें →
- मारवाड़जोधपुर-बीकानेर दरबारउपशैलियाँजोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, अजमेर, नागौर, सिरोही, जैसलमेर; घाणेराव, रियाँ, भिनाय, जूनियाँ ठिकाणापहचानबादाम-सी आँखें, ऊँची पाग, लाल-पीले रंग की अधिकता, खंजन पक्षीपूरे नोट्स पढ़ें →
- किशनगढ़बणी-ठणी की शैलीपहचानलंबे चेहरे, कमल-पंखुड़ी-सी आँखें, हंस और नौकाओं वाली झील के दृश्यपूरे नोट्स पढ़ें →
- ढूंढाड़जयपुर का सूरतखानाउपशैलियाँआमेर, जयपुर, शेखावाटी, अलवर; उणियारा उपशैली; झिलाय, ईसरदा, शाहपुरा, सामोद ठिकाणापहचानमुगल-राजपूत समन्वय, आदमकद पोर्ट्रेट, भित्ति चित्रपूरे नोट्स पढ़ें →
- हाड़ौतीहाड़ा चौहानों का क्षेत्रउपशैलियाँबूंदी, कोटा, झालावाड़पहचानबूंदी: पक्षी, घने बादल, हरे वृक्ष · कोटा: शिकार के दृश्य
आरंभ
- आलनिया और दर्रा (कोटा), बैराठ (तब जयपुर जिला, अब कोटपूतली-बहरोड़) तथा दर (भरतपुर क्षेत्र) के शैलाश्रयों में सबसे पुराने चित्र मिलते हैं; वी.एस. वाकणकर ने 1953 में चम्बल घाटी और दर्रा में चित्रित शैलाश्रयों की खोज की।
- चित्रित ग्रंथ: ओघ निर्युक्ति वृत्ति और दस वैकालिका सूत्र चूर्णि (1060 ई.), जैसलमेर भंडार में मिले; ये राजस्थान में उपलब्ध सबसे प्राचीन चित्रित ग्रंथ हैं।
- विशुद्ध राजस्थानी चित्रकला का जन्म लगभग 1500 ई. में हुआ, जन्मभूमि मेदपाट (मेवाड़) है; पहले जैन, गुजरात और अपभ्रंश शैली का प्रभाव था, बाद में मुगल प्रभाव आया।
- विषय: कृष्ण लीला, रागमाला, बारहमासा, नायिका भेद, शिकार, दरबार और व्यक्ति-चित्र; कागज, कपड़े तथा महलों, हवेलियों और मंदिरों की दीवारों पर।
प्रमुख तिथियाँ एवं कृतियाँ
| वर्ष | कृति | शैली और चित्रकार |
|---|---|---|
| 1260 | श्रावकप्रतिक्रमणसूत्रचूर्णि | मेवाड़, तेजसिंह के काल में |
| 1423 | सुपासनाह चरियम् | मेवाड़, देलवाड़ा में लिखा गया |
| 1540 | परिजात अवतरण (भागवत पुराण) | मेवाड़, नानाराम, उदयसिंह के काल में |
| 1591 | चुनार रागमाला | बूंदी शैली के सबसे पुराने ज्ञात चित्र; वाराणसी के पास चुनार में अकबर के चित्रकार मीर सैयद अली के तीन शिष्यों ने बनाए |
| 1591 | यशोधरा चरित्र | आमेर, ढूंढाड़ |
| 1592 | ढोलामारू | मेवाड़, चावंड, महाराणा प्रताप के काल में; राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुरक्षित |
| 1605 | रागमाला (चावंड रागमाला) | मेवाड़, अमरसिंह प्रथम के काल में; चित्रकार निसारदीन (नसीरुद्दीन भी लिखा जाता है) |
| 1610 | भागवत | मारवाड़, मेवाड़ और मारवाड़ दोनों की विशेषताओं वाला |
| 1623 | रागमाला चित्रावली | मारवाड़, चित्रकार वीरजी, पाली के विट्ठलदास चाँपावत के लिए |
| 1628 | रागमाला | मेवाड़, साहिबदीन, जगतसिंह प्रथम के काल में |
| 1639 | रसिकप्रिया, कृष्ण रुक्मिणी री वेलि | आमेर, मिर्जा राजा जयसिंह की रानी चन्द्रावती के लिए |
| 1648 | भागवत पुराण | मेवाड़, साहिबदीन |
| 1698 | 'राजा पाबूजी' का व्यक्ति-चित्र | अजमेर शैली, जूनियाँ का चाँद |
| 1725 | 'महाराजा अभयसिंह नृत्य देखते हुए' | मारवाड़, डालचन्द |
| 1750 | उम्मेदसिंह का जंगली सूअर का शिकार | बूंदी |
| 1857 | 'महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स' की स्थापना | जयपुर, सवाई रामसिंह; अब राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स |
राजस्थानी चित्रकला की विशेषताएँ
- लोक जीवन से जुड़ाव; भक्ति और शृंगार का सजीव चित्रण; चटकीले व चमकदार रंग; देश-काल के अनुरूप परिवेश।
- महलों, किलों, मंदिरों और हवेलियों में सबसे अधिक देखी जाती है।
- चित्रकारों ने विभिन्न ऋतुओं का शृंगारिक चित्रण कर उनका मानव जीवन पर प्रभाव अंकित किया।
- प्राकृतिक सौंदर्य के साथ नारी सौंदर्य का सजीव चित्रण।
- राजा-महाराजाओं, राजपुत्रों व सामन्तों के संरक्षण में फूली-फली।
हाड़ौती: बूंदी और कोटा
चौहानवंशी हाड़ाओं का प्रभुत्व बूंदी, कोटा और झालावाड़ क्षेत्र में रहा, इसलिए यह हाड़ौती कहलाया।
| बिंदु | बूंदी | कोटा |
|---|---|---|
| प्रभाव | पहले मेवाड़, राव सुरजन के समय से मुगल; भावसिंह और पुत्र अनिरुद्धसिंह के दक्षिण के युद्धों में जाने से दक्षिण शैली का समावेश | स्वतंत्र अस्तित्व का श्रेय महाराव रामसिंह को; भीमसिंह के समय कृष्ण भक्ति और वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव |
| चरमोत्कर्ष | राव छत्रसाल (शत्रुसाल) ने रंगमहल बनवाया, जो भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है; चित्रशाला राव उम्मेदसिंह के समय बनी | उम्मेदसिंह के समय; मुसव्विरखाने के कलाकारों ने दीवारों पर बड़े चित्र और बड़ी वसलियों पर शिकार के समूह-चित्र बनाए |
| पहचान | लम्बी आकृतियाँ, पतले शरीर; लाल अधर, गोलाकार मुख, पीछे झुकी चिबुक; काले बादल, बिजली, जलाशय, हरे वृक्ष, मोर, वानर; पक्षी विशेष महत्त्व के | पीन अधर, सुदीर्घ नासिका, पतली कमर वाली नारी; चौड़े कंधे, भरी-भरी दाढ़ी-मूँछें, मांसल देह, तलवार-कटार वाले पुरुष; घने जंगलों में शिकार, रानियाँ भी शिकार करती दिखाई गईं |
| रंग | सफेद-गुलाबी, लाल हिंगुल, हरा | हल्का हरा, पीला, नीला |
| चित्रकार | सुरजन, अहमदअली, रामलाल, श्री किशन, साधुराम | रघुनाथ, गोविन्दराम, डालू, लच्छीराम, नूर मोहम्मद |
| विषय | रागरागिनी, नायिका भेद, ऋतु वर्णन, बारहमासा, कृष्णलीला, दरबार, शिकार, हाथियों की लड़ाई, उत्सव | मुख्यतः शिकार; साथ में जुलूस और कृष्ण लीला |
झालावाड़: इसकी शैली का निर्धारण अभी शेष है; राजमहलों के भित्ति चित्रों में श्रीनाथजी, राधाकृष्ण लीला, रामलीला और राजसी वैभव मिलते हैं।
लोक एवं भित्ति चित्रकला
| कला | स्थान एवं कलाकार | माध्यम | विशेषता |
|---|---|---|---|
| फड़ | शाहपुरा (भीलवाड़ा); छीपा जाति के जोशी चितेरे; श्रीलाल जोशी (पद्मश्री, 2006) | कपड़े पर पट-चित्र | लोक देवताओं के जीवन-प्रसंग और चमत्कार; प्रमुख पात्र सबसे बड़ा |
| पिछवाई | नाथद्वारा | श्रीनाथजी के पीछे सजाने का बड़ा कपड़ा | कृष्ण लीला, गायें, कदली वृक्ष; पुष्टिमार्गीय परंपरा |
| पाने | सम्पूर्ण राजस्थान, उत्सवों पर | कागज | देवी-देवताओं के चित्र, दीवार चित्रों के विकल्प के रूप में; श्रीनाथजी का पाना सर्वाधिक कलात्मक, चौबीस शृंगारों सहित |
| मांडणा | ग्रामीण घर | दीवार और फर्श पर खड़िया (सफेद) और गेरू (लाल) से अंकन | देहरी, चौखट, आँगन, चबूतरा, घड़ा रखने का स्थान; विवाह पर गणेशजी व लक्ष्मीजी के पगल्या (पैर); तीर्थयात्रा से लौटने पर पुष्कर पेड़ी व पथवारी; त्रिकोण, चतुष्कोण, षट्कोण, अष्टकोण, वृत्त |
| सांझी | कुँवारी कन्याएँ | सफेदी पुती दीवार पर गोबर, काँच, मोती, कौड़ी, फूल-पत्ते | दशहरे से पूर्व श्राद्ध पक्ष में पन्द्रह दिन; माता पार्वती का रूप मानकर अच्छे वर-घर की कामना से पूजन; अंतिम पाँच दिन का बड़ा रूप संझया कोट |
| कावड़ | बस्सी गाँव (चित्तौड़गढ़); खैरादी परिवार का पुश्तैनी व्यवसाय; मांगीलाल मिस्त्री | कई द्वारों वाला चित्रित काष्ठ मंदिर | लाल रंग पर काले रंग से पौराणिक कथाएँ; अंतिम द्वार खुलने पर राम, लक्ष्मण व सीता की मूर्तियाँ |
| शेखावाटी के भित्ति चित्र | नवलगढ़, रामगढ़, फतेहपुर, लक्ष्मणगढ़, मुकुन्दगढ़, मंडावा, बिसाऊ; महणसर | हवेलियों की दीवारें | श्रेष्ठियों की हवेलियाँ; 'ओपन आर्ट गैलरी' कहलाती है; महणसर में पोद्दारों की हवेली 'सोने-चाँदी की दुकान' (सोने की दुकान) भित्ति चित्रों में सोने के प्रयोग के लिए प्रसिद्ध |
फड़ कैसे बनती है
- कपड़ा: मोटे हाथकते दो सूती कपड़ों (रेजी या रेजा) पर गेहूँ या चावल के माँड में गोंद मिलाकर कलफ लगाया जाता है, फिर घोटकर समतल करते हैं।
- रंग: पाँच या सात; गेरू, हिरमिच, जंगाल, हरताल, प्योड़ी, सिन्दूर, हिंगुल, काजल, चूना व नील आदि।
- क्रम: सर्वप्रथम सिन्दूरी रंग शरीर में, फिर हरा व लाल कपड़ों में, भूरा वास्तु-निर्माण में; अंतिम रेखाएँ (खुलाई) काले रंग से।
- रंग-संकेत: देवियाँ नीली, देव लाल, राक्षस काले, साधु सफेद या पीले; सिन्दूरी और लाल रंग शौर्य के प्रतीक।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- शाहपुराभीलवाड़ा में फड़ का कस्बा · मेवाड़ की उपशैली के रूप में भी · और ढूंढाड़ का ठिकाणा भी।
- उम्मेदसिंहबूंदी के राव उम्मेदसिंह ने चित्रशाला बनवाई · कोटा शैली का चरमोत्कर्ष महाराव उम्मेदसिंह के समय।
- नाथद्वारामेवाड़ की उपशैली है, ढूंढाड़ की नहीं।
- भित्ति तकनीकआलागीला, आराइश और मोराकसी गीले चूने के पलस्तर की एक ही पद्धति, आमेर से आरंभ · मणिकुट्टिम में मोती, लाख व लकड़ी की मणियाँ चिपकाई जाती हैं, सवाई माधोसिंह प्रथम के समय।
- बणी-ठणीकिशनगढ़, निहालचंद · साहिबदीन (मेवाड़), अली रज़ा (बीकानेर) या शिवदास (मारवाड़) नहीं।
खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
समान पात्रता परीक्षा (स्नातक स्तर) 2022 · प्रश्न 11
‘महणसर’ प्रसिद्ध है –
- (1)सोने की चित्रकारी के लिए
- (2)मुगलकालीन चित्रों की अधिकता के लिए
- (3)360 खिड़कियों की हवेली के लिए
- (4)सती माता मन्दिर के लिए
उत्तर देखें
✓ (1) सोने की चित्रकारी के लिए
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसमान पात्रता परीक्षा (स्नातक स्तर) 2022 · प्रश्न 18
साहिबदीन नामक चित्रकार को मेवाड़ के किस शासक का संरक्षण प्राप्त था?
- (1)महाराणा राजसिंह
- (2)महाराणा अमरसिंह
- (3)महाराणा जगतसिंह ।
- (4)महाराणा कुम्भा
उत्तर देखें
✓ (3) महाराणा जगतसिंह ।
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसमान पात्रता परीक्षा (स्नातक स्तर) 2022 · प्रश्न 23
श्रीधर अंधारे को किस चित्रशैली को प्रकाश में लाने का श्रेय दिया जाता है?
- (1)किशनगढ़
- (2)देवगढ़
- (3)शाहपुरा
- (4)उणियारा
उत्तर देखें
✓ (2) देवगढ़
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसमान पात्रता परीक्षा (सीनियर सैकण्डरी स्तर) 2024 · प्रश्न 49
फड़ कलाकार श्री लाल जोशी राजस्थान के किस स्थान से सम्बंधित हैं?
- (1)भीलवाड़ा
- (2)जयपुर
- (3)सीकर
- (4)चूरू
उत्तर देखें
✓ (1) भीलवाड़ा
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसंरक्षण अधिकारी 2022 · प्रश्न 134
चन्दुलाल, मुकुन्द, मुन्नालाल किस चित्र-शैली के चित्रकार थे ?
- (1)मेवाड़ शैली
- (2)बीकानेर शैली
- (3)जयपुर शैली
- (4)अलवर शैली
उत्तर देखें
✓ (2) बीकानेर शैली
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसंरक्षण अधिकारी 2024 · प्रश्न 16
मेवाड़ शैली में 1648 ई. में 'भागवत' का चित्रण किसके द्वारा किया गया?
- (1)मुस्तफा
- (2)हसन
- (3)अली रज़ा
- (4)साहबदी
उत्तर देखें
✓ (4) साहबदी
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंआरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2023 · प्रश्न 127
प्रसिद्ध चित्रकार मुहम्मद शाह जयपुर के किस महाराजा का दरबारी चित्रकार था ?
- (1)सवाई राम सिंह द्वितीय
- (2)सवाई जगत सिंह
- (3)सवाई प्रताप सिंह
- (4)सवाई जय सिंह
उत्तर देखें
✓ (4) सवाई जय सिंह
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंआरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2024 · प्रश्न 130
सूची-I व सूची-II को सुमेलित करते हुए राजस्थान की प्रसिद्ध चित्रकला शैलियों एवं उनके चित्रकारों के संबंध में सही विकल्प चुनिये : सूची-I — सूची-II A. किशनगढ़ — i. साहिबदीन B. बीकानेर — ii. निहालचंद C. मेवाड़ — iii. अली रज़ा D. मारवाड़ — iv. शिवदास कूट :
- (1)A-ii, B-iv, C-i, D-iii
- (2)A-ii, B-iii, C-i, D-iv
- (3)A-ii, B-iii, C-iv, D-i
- (4)A-ii, B-i, C-iii, D-iv
उत्तर देखें
✓ (2) A-ii, B-iii, C-i, D-iv
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