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राजस्थान के लोक संगीत, वाद्य यंत्र एवं लोक नाट्य

राजस्थान का लोक संगीत वंशानुगत संगीत जातियाँ गाती हैं, और संस्कारों व त्योहारों पर अधिकतर स्त्रियाँ। लोक नाट्य गायन-प्रधान ख्याल से लेकर धागे की कठपुतली तक फैला है; परीक्षा में रूप का स्थान, जाति, प्रवर्तक या वाद्य और वाद्य का वर्ग पूछा जाता है।

⏱ 8 मिनट पढ़ें4 विस्तृत पृष्ठ✓ तथ्य जाँचे गए 15 अक्टूबर 2026

विषय-सूची

एक नज़र में

  1. वाद्यों के चार वर्ग: तत (तार वाले), सुषिर (फूँक वाले), अवनद्ध (चमड़े से मढ़े) और घन (ठोस, स्वयं बजने वाले)।
  2. स्त्री पात्र: गवरी और कुचामनी ख्याल में इन्हें पुरुष निभाते हैं; जयपुरी ख्याल में स्त्रियाँ भी निभाती हैं।
  3. लोक गीतों के तीन भाग: जन-सामान्य के गीत, संगीत को व्यवसाय के रूप में अपनाने वाली जातियों के गीत और क्षेत्रीय गीत। सबसे अधिक गीत शृंगार रस के हैं, जिनमें वियोग शृंगार अधिक है।
  4. माँड: राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध गायकी, जिसकी उदयपुर, जोधपुर, जयपुर-बीकानेर और जैसलमेर की अलग-अलग शैलियाँ हैं।

लोक नाट्य

तत वाद्य (तार वाले)

वाद्यबजाने वालेविशेषता
रावणहत्थापाबूजी के भोपेनारियल के खोल का ढाँचा, बाँस की डंडी और घोड़े की पूँछ के बालों का गज
जंतरगुर्जरों के भोपेवीणा जैसा, दो तूँबों वाला; तारों को ऊपर की ओर छेड़ा जाता है
कामायचामांगणियारढाँचा आम या रोहिड़ा की लकड़ी के एक ही टुकड़े से; 17 तार
सिंधी सारंगीजैसलमेर और बाड़मेर के लंगालकड़ी के एक ही टुकड़े से बनी; ताँत के चार बजाने वाले तार और इस्पात के 22 सहायक तार
सुरिंदालंगा
तंदूरा (चौतारा)कामड़चार तार; रामदेवजी के भजनों के साथ बजाया जाता है
भपंगमेवात क्षेत्र (अलवर अंचल) के जोगीतूँबे के खोल पर मढ़ी खाल के बीच से निकला एक तार; भजनों के साथ बजता है

सुषिर वाद्य (फूँक वाले)

वाद्यबजाने वालेविशेषता
अलगोजादो बाँसुरियाँ एक साथ फूँकी जाती हैं, एक से धुन और दूसरी से आधार स्वर
सताराजैसलमेर-बाड़मेर क्षेत्र के मेघवालअकेले, बिना गायन के, जटिल स्वर-समूहों में बजाया जाता है
पूंगीकालबेलियापरंपरागत रूप से साँप पकड़ने के लिए बजाई जाती है
मशकचमड़े की थैली में हवा भरी जाती है; इसकी नलियों से आधार स्वर या धुन बजती है
शहनाईकुचामनी और शेखावाटी ख्यालघूमर के साथ भी बजती है
बाँकियागैरजुलूसों और समारोहों में बजता है; गैर में ढोल और थाली के साथ

अवनद्ध वाद्य (चमड़े से मढ़े)

वाद्यबजाने वालेविशेषता
ढोलगैर और घूमरबड़ा, दोनों ओर मढ़ा; लकड़ी के डंडों से बजाया जाता है
ढोलकमांगणियार और लंगा सहित अनेकदोनों ओर मढ़ी; दोनों हाथों से, प्रायः बैठकर बजाई जाती है
नगाड़ागींदड़; हेला ख्याल (बम, बड़ा नगाड़ा)बड़े नगाड़े खड़े होकर बड़े डंडों से, छोटे जोड़ी में बैठकर बजते हैं; पहले युद्ध का वाद्य था
चंगशेखावाटी की होली; तुर्रा कलंगी ख्यालचंग नृत्य में हर नर्तक एक चंग बजाता है
डफचारबैत के गायकबालकों के 'ढप के गीत' इसी के नाम पर हैं
खंजरीकालबेलिया; जोगी
मांदलगवरी में भील

घन वाद्य (ठोस)

वाद्यबजाने वालेविशेषता
खड़ताल (खरताल)मांगणियारलकड़ी की चार पतली पट्टियाँ, दोनों हाथों में दो-दो, नृत्य जैसी झूमती मुद्रा में बजाई जाती हैं
मोरचंगलंगालोहे का छोटा वाद्य, जिसे दाँतों के बीच दबाकर उसकी जीभ उँगली से छेड़ी जाती है; मुँह गूँज का काम करता है
मंजीराकामड़; जोगीधातु की छोटी झाँझें
थालीगैर और गवरीधातु की थाली, जिसे घंटे की तरह बजाया जाता है
चिमटारम्मत की मंडलियाँ; जोगी

गायक जातियाँ और गायन शैलियाँ

लोक गीत

प्रकारगीतकब और कहाँ
संस्कारबना-बनी, बिंदोला, घोड़ी, जला, मायरा, हल्दी; जन्म पर जच्चाविवाह और जन्म पर; अधिकतर स्त्रियाँ गाती हैं
त्योहारखेलण दो गणगौर; तीज के गीत; घूमर गीत 'म्हारी घूमर छे नखराली'गणगौर, तीज और होली; होली पर पुरुषों की टोलियाँ रसिया, होरी और धमाल गाती हैं
ऋतुएँफाग, बीजण, शियाळा, बारहमासा, चेती, कजली, जाड़ा; सावन के गीत चौमासा, पपैयो, बदली, मोरशरद, ग्रीष्म, वर्षा और बसंत; इंद्रदेव की स्तुति
वस्तुएँ और भावइंडोणी, कांगसियो, गोरबंद, पणिहारी, लूर, ओळूँ, सुपणा, हिचकी, काजलिया, कागाआकांक्षाएँ और भाव प्रकृति या वस्तुओं के माध्यम से
मरुस्थलकुरजाँ, पीपली, रतन राणो, मूमल, घूघरी, केवड़ाबाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर और जोधपुर
मेवाड़ और दक्षिणी पहाड़ी क्षेत्रपटेल्या, बीछियो, लालर, माछर, नोखीला, थारी ऊँटा री असवारी, नावरी असवारी, शिकार; हमसीढ़ोभील, मीणा, गरासिया और सहरिया क्षेत्र; हमसीढ़ो उत्तरी मेवाड़ के भीलों में स्त्री-पुरुष मिलकर गाते हैं
देवी-देवता और संततेजाजी, देवजी, पाबूजी, गोगाजी और जुझारजी के भजन; मीरा, कबीर, दादू और रैदास के पद; कैला देवी के लांगुरियालांगुरिया करौली में बहुत लोकप्रिय; भरतपुर और कामाँ में कृष्ण-लीला के गीत

याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं

  • मोरचंग का वर्गसंस्कृति मंत्रालय के इंडियन कल्चर पोर्टल पर घन वाद्य, और राजस्थान पर्यटन इसे ताल-वाद्यों में गिनता है; कई परीक्षा-पुस्तकें इसे सुषिर बताती हैं।
  • भपंग का वर्गपरीक्षा-पुस्तकें इसे तत वाद्य बताती हैं; राजस्थान पर्यटन और सहपीडिया इसे ताल-वाद्य ('बोलता ढोल') कहते हैं।
  • कामायचा या सिंधी सारंगीकामायचा, मांगणियार · सिंधी सारंगी, लंगा।
  • दंगलटोंक का चारबैत और मेवाड़ का तुर्रा कलंगी ख्याल, दोनों संगीत दंगल के रूप में खेले जाते हैं।
  • मेवाड़ या मरु के गीतबीछियो, लालर, नोखीला और शिकार (एक प्रश्न-पत्र में 'शिखर') मेवाड़ के गीत हैं · कुरजाँ, मूमल और पीपली मरु क्षेत्र के।

खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न

समान पात्रता परीक्षा (स्नातक स्तर) 2022 · प्रश्न 20

निम्नलिखित में से कौन सा वाद्य यंत्र बाकी तीन से अलग है?

  1. (1)खड़ताल
  2. (2)मशक
  3. (3)शहनाई
  4. (4)अलगोज़ा
उत्तर देखें

आरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2024 · प्रश्न 128

लोक वाद्ययंत्र 'चौतारा' के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए एवं निम्नांकित में से सही विकल्प चुनिए : A. यह चार तारों वाला वाद्ययंत्र है । B. यह सामान्यतः रामदेवजी के भजन गाने में प्रयुक्त होता है ।

  1. (1)केवल A सत्य है ।
  2. (2)केवल B सत्य है ।
  3. (3)A और B दोनों सत्य हैं ।
  4. (4)A और B दोनों असत्य हैं ।
उत्तर देखें

✓ (3) A और B दोनों सत्य हैं ।

पूरा प्रश्न-पत्र देखें

समान पात्रता परीक्षा (सीनियर सैकण्डरी स्तर) 2024 · प्रश्न 25

बिछियौ, लालर, नोखिला और शिखर राजस्थान के _________ हैं।

  1. (1)लोक नाटक
  2. (2)लोक गीत
  3. (3)लोक नृत्य
  4. (4)वाद्ययंत्र
उत्तर देखें

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