एक नज़र में
- कुवलयमाला: जैन साधु उद्योतन सूरि की प्राकृत कथा, जालौर (जाबालिपुर) में वि.सं. 835 में रची गई; इसमें 18 प्रदेशों की बोलियों का उल्लेख है, जिनमें मरु (मरु प्रदेश के लोगों की बोली) भी है। वि.सं. 835 हीरालाल माहेश्वरी के अनुसार 778 ई. और ए.एन. उपाध्ये के संस्करण के अनुसार 779 ई. है; RBSE की पुस्तक में 'वि.सं. 835 (913 ई)' छपा है।
- नाम: राजस्थान की भाषा के लिए 'राजस्थानी' नाम जॉर्ज ग्रियर्सन ने लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया में दिया। RBSE की पुस्तक में वर्ष 1912 है; सर्वे का राजस्थानी खंड (खंड IX, भाग II), जिसमें लिखा है कि यह नाम सर्वे के लिए गढ़ा गया, 1908 का है।
- डिंगल मरुभाषा (मारवाड़ी) का साहित्यिक रूप है, जिसमें अधिकांश चारण काव्य रचा गया; पिंगल राजस्थानी मिली हुई ब्रजभाषा है।
- लिपि: राजस्थानी देवनागरी में लिखी जाती है। व्यापारी इसे मात्राओं के बिना लिखते हैं; इस शैली को महाजनी या बणियावटी और इसके अक्षरों को 'मुड़िया' कहते हैं।
- स्थिति (17 अक्टूबर 2026 को जाँची गई): राजस्थानी आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं में शामिल नहीं है। साहित्य अकादमी इसे साहित्यिक भाषा के रूप में मान्यता देती है।
अपभ्रंश से राजस्थानी तक
- वंश: राजस्थानी का विकास अपभ्रंश से हुआ। इसके स्रोत के रूप में तीन अपभ्रंशों (शौरसेनी, नागर और मरुगुर्जर) का नाम लिया जाता है; इनमें मरुगुर्जर अपभ्रंश का मत अधिक उचित माना जाता है, क्योंकि राजस्थानी और गुजराती दोनों का विकास उसी से हुआ।
- चरण: प्राचीन राजस्थानी ने 11वीं सदी में रूप लिया और लगभग 1450 ई. तक गुजराती के साथ एक ही भाषा (मरुगुर्जर) रही; माहेश्वरी दोनों का अलग होना लगभग 1450 ई. से मानते हैं, जबकि RBSE की पुस्तक के अनुसार 16वीं सदी के बाद राजस्थानी स्वतंत्र भाषा के रूप में विकसित हुई।
- नाम: पुराना नाम मरुभाषा है (पृथ्वीराज राठौड़ की वेलि के ब्रजभाषा अनुवादक गोपाल लाहौरी ने इसका प्रयोग किया); 'राजस्थानी' नया नाम है, जो प्रदेश के नाम पर पड़ा।
बोलियाँ और उनके क्षेत्र
| बोली | क्षेत्र | उप-बोलियाँ एवं टिप्पणी |
|---|---|---|
| मारवाड़ी | जोधपुर, बीकानेर, नागौर, बाड़मेर, जैसलमेर, पाली तथा शेखावाटी का कुछ भाग | थळी और गोड़वाड़ी इसकी उप-बोलियाँ हैं। इसका क्षेत्र बाकी सभी राजस्थानी बोलियों के कुल क्षेत्र से बड़ा है और इसकी साहित्य-परंपरा सबसे प्राचीन और समृद्ध है। |
| मेवाड़ी | उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद तथा भीलवाड़ा | ग्रियर्सन इसे मारवाड़ी का ही एक रूप मानते हैं। |
| ढूँढाड़ी | जयपुर, दौसा, बगरू तथा दूदू | उप-बोलियाँ: तोरावाटी, राजावाटी और नागरचाल (RPSC के 2024 के प्रश्नपत्र में 'नागरचोल'); ग्रियर्सन चौरासी और कठेरा भी गिनाते हैं। इसकी पहचान 'छै' शब्द है, जो गुजराती के प्रभाव का संकेत है। |
| हाड़ौती | कोटा, बूँदी, झालावाड़ और बारां | |
| मेवाती | अलवर और भरतपुर, मेव जाति का क्षेत्र (मेवात), जो हरियाणा तक फैला है | भरतपुर के आसपास ब्रजभाषा का प्रभाव स्पष्ट है। ग्रियर्सन अहीरवाटी को मेवाती का ही एक रूप मानते हैं। |
| वागड़ी | बांसवाड़ा, डूंगरपुर तथा आसपास के पहाड़ी क्षेत्र | इस पर गुजराती का प्रभाव स्पष्ट है। |
| मालवी | राजस्थान में प्रतापगढ़; मध्यप्रदेश में रतलाम, झाबुआ | रांगड़ी और नीमाड़ी इसकी उप-बोलियाँ हैं; ग्रियर्सन नीमाड़ी को मालवी की ही शाखा मानते हैं, जो अलग बोली बन गई। |
| शेखावाटी | राव शेखा के नाम पर प्रसिद्ध शेखावाटी क्षेत्र; RBSE की पुस्तक चूरू, झुंझुनूं, हनुमानगढ़, सूरतगढ़ और गंगानगर गिनाती है | ग्रियर्सन इसे मारवाड़ी का एक रूप मानते हैं। |
| बागड़ी (बागरी) | उत्तर का बागड़ क्षेत्र (हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर तथा बीकानेर और चूरू के कुछ भाग), जो हरियाणा और पंजाब तक फैला है | ग्रियर्सन इसे शेखावाटी के साथ उत्तरी मारवाड़ी में रखते हैं। |
| भीली और अन्य पहाड़ी बोलियाँ | डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा मेवाड़ के पहाड़ी भाग | भील, मीणा और गरासिया जनजातियाँ इन्हें बोलती हैं; हर क्षेत्र की बोली पर वहाँ की बोलियों का प्रभाव है। |
बोलियों का वर्गीकरण
| विद्वान या ग्रंथ | वर्ग | प्रत्येक वर्ग की बोलियाँ |
|---|---|---|
| ग्रियर्सन, लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया | पाँच बोलियाँ | पश्चिमी: मारवाड़ी। मध्य-पूर्वी: जयपुरी (ढूँढाड़ी) और हाड़ौती (हरौती)। उत्तर-पूर्वी: मेवाती और अहीरवाटी। दक्षिण-पूर्वी: मालवी और नीमाड़ी। |
| RBSE की कक्षा 10 की पुस्तक | दो वर्ग | पश्चिमी राजस्थानी: मारवाड़ी, मेवाड़ी, बागड़ी, शेखावाटी। पूर्वी राजस्थानी: ढूँढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, अहीरवाटी (राठी)। |
| हीरालाल माहेश्वरी | पाँच शाखाएँ | मारवाड़ी-मेवाड़ी; जयपुरी-हाड़ौती; मेवाती-अहीरवाटी; मालवी; भीली या बागड़ी (डूंगरपुर-बांसवाड़ा के वागड़ की बोली)। |
डिंगल और पिंगल का प्रयोग
- पिंगल में रचित: पृथ्वीराज रासो, विजयपाल रासो, राजविलास और वंश भास्कर का अधिकांश भाग।
- 'डिंगल' शब्द का पहला प्रयोग: माहेश्वरी इसे (पिंगल के साथ) संत-कवि सूरजनदास पीनिया के लगभग 1640 ई. या उससे पहले के एक छप्पय में पाते हैं; मोतीलाल मेनारिया पहला प्रयोग बाँकीदास की 'कुकवि-बत्तीसी' (वि.सं. 1871) में बताते हैं।
- गीत: डिंगल गीत चारण काव्य का विशिष्ट छंद है, जिसमें वयणसगाई (अनुप्रास) का नियम कठोरता से माना जाता है; दोहा, छप्पय और निसाणी चारण काव्य के अन्य प्रचलित छंद हैं।
राजस्थानी साहित्य के काल
| काल (RBSE) | काल-क्रम | स्वरूप |
|---|---|---|
| प्राचीन काल: वीरगाथा काल | 1050 से 1550 ई. | वीर रसात्मक काव्य, क्योंकि शासकों को पश्चिम से होने वाले आक्रमणों का सामना करना पड़ रहा था। जैन रचनाकारों ने भी लिखा। |
| पूर्व मध्य काल: भक्ति काल | 1450 से 1650 ई. | संतों और संप्रदायों (रामस्नेही, दादूपंथ, नाथपंथ, अलखिया, विश्नोई, जसनाथी) ने नाम-स्मरण, निर्गुण उपासना और गुरु की महत्ता पर बल दिया; सगुण भक्त कवियों ने अपने आराध्य देवों की महिमा गाई। |
| उत्तर मध्य काल: शृंगार, रीति एवं नीति | 1650 से 1850 ई. | शृंगार, रीति (काव्य-शास्त्र) और नीति संबंधी रचनाएँ, उन शासकों के संरक्षण में जो कवियों और कलाकारों को आश्रय देते थे। |
| आधुनिक काल | 1850 ई. से अद्यतन | 1857 के बाद नई चेतना; इसकी शुरुआत मारवाड़ के कविराजा बाँकीदास और बूँदी के सूर्यमल्ल मीसण ने की। |
माहेश्वरी इसे तीन कालों में बाँटते हैं: प्राचीन (1050–1450 ई.), मध्यकाल (1450–1850 ई.) और आधुनिक (1850 ई. के बाद)।
साहित्य की विधाएँ
| विधा | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| रासो | राजा की कीर्ति, विजय, युद्ध और वीरता का विस्तृत वर्णन करने वाला काव्य। | |
| ख्यात | शासकों द्वारा अपने सम्मान और कार्यों के विवरण के रूप में लिखवाया गया इतिहास। | मुहणोत नैणसी री ख्यात (नैणसी, 1610–1670 ई.); दयालदास री ख्यात; बाँकीदास री ख्यात |
| वात | कहानी की तरह कहने-सुनने की विधा: कहने वाला कहता चलता है और सुनने वाला 'हुंकारा' देता है। वातें गद्य, पद्य और गद्य-पद्य तीनों रूपों में मिलती हैं। | |
| विगत | किसी विषय का विस्तृत विवरण, जैसे राज्य के शासक, परिवार और प्रमुख व्यक्ति; इसके आँकड़े आर्थिक दृष्टि से उपयोगी हैं। | मारवाड़ रा परगनां री विगत (नैणसी) |
| वचनिका | पद्य मिश्रित तुकांत गद्य रचना, संस्कृत 'वचन' शब्द से बनी। | |
| दवावैत | वचनिका की तरह पद्य मिश्रित तुकांत गद्य; इसमें नायक का गुणगान, राज्य-वैभव, युद्ध और आखेट का वर्णन होता है। वचनिका राजस्थानी में होती है, जबकि दवावैत में उर्दू और फारसी के शब्द मिलते हैं (RBSE; माहेश्वरी: खड़ी बोली या उर्दू मिली राजस्थानी)। | अखमाल देवड़ा री दवावैत; महाराणा जवानसिंह री दवावैत; राजा जयसिंह री दवावैत |
| वेलि | 'वेलियो' छंद में लिखे गए ग्रंथ, जिनके विषय धार्मिक या ऐतिहासिक रहे हैं। | दईदास जैतावत री वेलि; वेलि क्रिसन रुकमणी री |
| प्रकास और रूपक | किसी वंश या व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों पर रचे गए काव्य। | राजप्रकास, सूरज प्रकास; राजरूपक, रूपक गोगादेजी रो |
| मरस्या | राजा या किसी व्यक्ति की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने वाली रचना, जिसमें उसके चरित्र और कार्यों का वर्णन होता है। | राणे जगपत रा मरस्या (मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह की मृत्यु पर) |
| झूलणा और झमाल | छंद; अनेक चारण काव्यों के नाम इन्हीं पर रखे गए हैं। | झूलणा: राजा गजसिंह रा झूलणा, राव सुरतांण देवड़े रा झूलणा, अमरसिंह रा झूलणा · झमाल: राव इन्द्रसिंह री झमाल |
प्रमुख ग्रंथ और रचनाकार
| ग्रंथ | रचनाकार | काल और विषय |
|---|---|---|
| रणमल्ल छंद | श्रीधर व्यास | प्राचीन काल; ईडर के राव रणमल राठौड़ और गुजरात के सूबेदार जफर खाँ का युद्ध |
| अचलदास खींची री वचनिका | चारण शिवदास गाडण | गागरोन के खींची शासक अचलदास और मालवा के होशंगशाह का युद्ध |
| राठौड़ रतनसिंह महेसदासोत री वचनिका | खिड़िया जग्गा | धरमत का युद्ध (1658 ई.) और रतलाम के रतनसिंह राठौड़ का बलिदान |
| सगत रासो | गिरधर आसिया | राणा प्रताप के छोटे भाई शक्तिसिंह, उनके पुत्र अचलसिंह और पौत्र नरहरि की वीरता |
| खुमाण रासो | दौलत विजय | 18वीं सदी का आरंभ; बप्पा रावल से महाराणा राजसिंह तक के मेवाड़ के शासकों का वृत्तांत |
| शत्रुसाल रासो | डूंगरसी (माहेश्वरी के अनुसार राव डिंगरसी) | मध्यकाल |
| रतन रासो | कुम्भकर्ण सांदू | मध्यकाल; शाहजहाँ के पुत्रों का संघर्ष और धरमत का युद्ध |
| राम रासो | माधोदास दधवाड़िया | भक्ति काल; राम की कथा |
| वेलि क्रिसन रुकमणी री | पृथ्वीराज राठौड़ (1549–1600 ई.) | भक्ति काल; 1580 ई. में रचित; कृष्ण-रुक्मिणी विवाह; वेलि परंपरा की प्रमुख रचना |
| हरिरस और देवियांण | ईसरदास बारहठ | भक्ति काल; एक चारण कवि की भक्ति-रचनाएँ |
| नागदमण | सायांजी झूला | भक्ति काल; कृष्ण द्वारा कालिय नाग का दमन |
| राजरूपक और सूरज प्रकास | वीरभाण रतनू और करणीदान कविया | उत्तर मध्य काल; जोधपुर के महाराजा अभयसिंह के दरबारी कवि, जिन्होंने सरबुलंद खाँ पर उनके अहमदाबाद के युद्ध (1730 ई.) का वर्णन किया |
| राजिया रा सोरठा | कृपाराम खिड़िया | उत्तर मध्य काल; सेवक राजिया को संबोधित नीति-परक सोरठे, जिनमें से हर एक में राजिया का नाम है |
| वंश भास्कर और वीर सतसई | बूँदी के सूर्यमल्ल मीसण (1815–1868 ई.) | आधुनिक काल; वंश भास्कर बूँदी के शासकों का पद्यबद्ध इतिहास है; वीर सतसई अधूरी है |
- चौहानों पर लिखे ग्रंथ (पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो, हम्मीर रासो, कान्हड़दे प्रबंध) चौहान-पृष्ठ पर हैं; केसरीसिंह बारहठ का 'चेतावनी रा चुंगटिया' व्यक्तित्व-पृष्ठ पर है।
आधुनिक राजस्थानी साहित्य
- बाँकीदास (मृत्यु 1833 ई.): जोधपुर के महाराजा मानसिंह के दरबारी कवि और इतिहासकार।
- शिवचन्द्र भरतिया (1853–1918 ई.): राजस्थानी के प्रथम आधुनिक गद्यकार कहे जाते हैं; उनकी रचनाओं में उपन्यास 'कनक सुंदर' और नाटक 'केसर विलास' हैं।
- कन्हैयालाल सेठिया: उनका गीत 'धरती धोरां री' राजस्थान का आदर्श गीत कहा जाता है; 'मींझर' और 'लीलटांस' उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैं।
- विजयदान देथा: 'बातां री फुलवाड़ी', जिसमें राजस्थान की लोक-कथाएँ उनकी अपनी शैली में हैं; RBSE की पुस्तक में 13 खंड, CET स्नातक 2022 की कुंजी में 14।
- सीताराम लालस: राजस्थानी-हिंदी कोश 'राजस्थानी सबद कोस' के संकलनकर्ता।
लोक साहित्य
- लोक गाथा: पाबूजी का पवाड़ा भोपे फड़ (चित्रित पट) के सामने गाते हैं; फड़ का विवरण लोक देवता पृष्ठ पर है।
- लोक कथा: मौखिक परंपरा की वातें; विजयदान देथा और लक्ष्मी कुमारी चूंडावत ने इन्हें नए रूप में लिखा।
- पहेलियाँ: आड़ी और हीयाली राजस्थानी में पहेलियों के नाम हैं।
- लोक गीत और लोक नाट्य (ख्याल, स्वांग, लीला) लोक संगीत और नाट्य के पृष्ठ पर हैं।
राजकीय स्थिति और संस्थाएँ
- 2003 ई.: राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का संकल्प पारित किया।
- 16 मार्च 2021: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लोकसभा में बताया कि राजस्थानी को शामिल करने की माँगें आई हैं, पर भाषाएँ जोड़ने का कोई निश्चित मानदंड नहीं है, इसलिए कोई समय-सीमा तय नहीं की जा सकती।
- 21 जुलाई 2023: सर्वोच्च न्यायालय ने इसे शामिल करने की याचिका (रिपुदमन सिंह बनाम भारत संघ) खारिज की और कहा कि किसी भाषा को जोड़ना सरकार का नीतिगत निर्णय है।
- 12 मई 2026: सर्वोच्च न्यायालय (पदम मेहता बनाम राजस्थान राज्य) ने राज्य को निर्देश दिया कि वह मातृभाषा में शिक्षा की नीति बनाए, शिक्षा के लिए राजस्थानी को स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता दे, इसे सभी सरकारी और निजी स्कूलों में चरणबद्ध रूप से विषय के रूप में लाए, और इसे क्रमशः शिक्षा का माध्यम बनाए, पहले बुनियादी (फाउंडेशनल) व प्रारंभिक (प्रिपरेटरी) चरणों में और आगे उच्च स्तरों पर।
- संस्थाएँ: राजस्थान साहित्य अकादमी (संगम), उदयपुर की स्थापना 1958 ई. में हुई; यह 'मधुमती' प्रकाशित करती है। राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर 'जागती जोत' प्रकाशित करती है।
- संतों और उनके ग्रंथों (मीरां, दादू, जाम्भोजी, चरणदास आदि, तथा सहजोबाई और दयाबाई की बोली) का विवरण संत-पृष्ठ पर है; इतिहास के स्रोत के रूप में ख्यात, विगत और बही इतिहास के स्रोत वाले पृष्ठ पर हैं।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- दूसरे नामढूँढाड़ी को जयपुरी भी कहते हैं · हाड़ौती को ग्रियर्सन 'हरौती' लिखते हैं · बांसवाड़ा-डूंगरपुर की वागड़ी उत्तर की बागड़ी नहीं है; माहेश्वरी वागड़ की बोली को 'बागड़ी' लिखते हैं।
- गद्य या पद्यख्यात और विगत गद्य हैं · वचनिका और दवावैत में तुकांत गद्य और पद्य मिले होते हैं · वात गद्य, पद्य या दोनों में हो सकती है · रासो, वेलि, रूपक, प्रकास, झूलणा और झमाल पद्य हैं। RPSC की 2024 की कुंजी में मुक्तक काव्य 'पंचक' है, वात या विगत नहीं।
- खुमाण रासोदौलत विजय और दलपत विजय एक ही जैन साधु हैं (दीक्षा से पहले नाम दलपत था); करणीदान कविया ने 'सूरज प्रकास' लिखा, खुमाण रासो नहीं। कुछ लोग खुमाण रासो को हिंदी साहित्य के आदिकाल में रखते हैं, पर इसकी रचना 18वीं सदी में हुई।
खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
समान पात्रता परीक्षा (स्नातक स्तर) 2022 · प्रश्न 25
‘बातां री फुलवारी’ कितने खण्डों में विभक्त है?
- (1)8
- (2)10
- (3)14
- (4)16
उत्तर देखें
✓ (3) 14
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसमान पात्रता परीक्षा (सीनियर सैकण्डरी स्तर) 2024 · प्रश्न 24
राजस्थान के कोटा, बूंदी और झालावाड़ क्षेत्र की बोली कौन सी है? (निम्न में से सबसे उपयुक्त विकल्प चुनें:)
- (1)वागड़ी
- (2)मालवी
- (3)हाड़ौती
- (4)भीली
उत्तर देखें
✓ (3) हाड़ौती
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसंरक्षण अधिकारी 2024 · प्रश्न 13
राजावटी, चौरासी और नागरचोल किस बोली की उप–बोलियाँ हैं?
- (1)बागड़ी
- (2)हाड़ौती
- (3)ढूँढाड़ी
- (4)मेवाती
उत्तर देखें
✓ (3) ढूँढाड़ी
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसंरक्षण अधिकारी 2024 · प्रश्न 17
राजस्थानी भाषा का 'मुक्तक काव्य' कौनसा है?
- (1)वात
- (2)हाल
- (3)विगत
- (4)पंचक
उत्तर देखें
✓ (4) पंचक
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंआरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2023 · प्रश्न 129
कुवलयमाला नामक कथा संग्रह में कितनी देशी भाषाओं के नाम का उल्लेख हुआ है ?
- (1)18
- (2)17
- (3)16
- (4)15
उत्तर देखें
✓ (1) 18
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंआरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2023 · प्रश्न 130
'अचलदास खींची री वचनिका' के लेखक हैं
- (1)गोपाल दान कविया
- (2)केसरी सिंह बारहठ
- (3)रामनाथ कविया
- (4)चारण शिवदास
उत्तर देखें
✓ (4) चारण शिवदास
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंआरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2024 · प्रश्न 129
निम्न में से कौन सा विकल्प सही सुमेलित नहीं है ?
- (1)पृथ्वीराज रासो – चंदरबरदाई
- (2)बीसलदेव रासो – नरपति
- (3)खुमाण रासो – करणीदान
- (4)शत्रुसाल रासो – डूंगरसिंह
उत्तर देखें
✓ (3) खुमाण रासो – करणीदान
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंआरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2024 · प्रश्न 134
निम्न में से किसके लिए राजस्थानी भाषा में आड़ी, हीयाली शब्द प्रचलित हैं ?
- (1)मुहावरे
- (2)लोकोक्ति
- (3)फड़
- (4)पहेलियाँ
उत्तर देखें
✓ (4) पहेलियाँ
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसमान पात्रता परीक्षा (स्नातक स्तर) 2024 · प्रश्न 132
‘राणे जगपत रा मरास्या’ किस शासक की मृत्यु का शोक मनाने के लिए लिखी गयी थी?
- (1)महाराजा जनक सिंह
- (2)महाराजा जगत सिंह
- (3)महाराजा जीवन सिंह
- (4)महाराजा जयदीप सिंह
उत्तर देखें
✓ (2) महाराजा जगत सिंह
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