एक नज़र में
- जन्म शिव तहसील के ऊँडूकासमेर (उण्डू-काश्मीर) गाँव में (RBSE पुस्तक में बाड़मेर ज़िला); पिता अजमालजी तँवर, माता मैणादे।
- पोकरण के निकट रामदेवरा (रूणीचा) बसाया और वहीं भाद्रपद शुक्ल एकादशी को जीवित समाधि ली; RBSE पुस्तक के अनुसार 1458 ई. में।
- रामदेवरा का मेला: भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी; सांप्रदायिक सद्भाव इसकी मुख्य विशेषता है।
- हिंदू उन्हें श्रीकृष्ण का अवतार और मुसलमान रामसा पीर मानते हैं; वे 'पीरों के पीर' कहलाते हैं।
- कामड़िया पंथ की स्थापना की; कामड़ महिलाएँ उनके सम्मान में तेरहताली नृत्य करती हैं।
- RPSC में पूछा गया: नेजा और रिखिया उनसे जुड़े हैं; चार तार वाला चौतारा उनके भजनों में बजता है।
- गुरु: बालीनाथ। पंच पीरों में से एक।
तथ्य
| जन्म स्थान | ऊँडूकासमेर (उण्डू-काश्मीर) गाँव, शिव तहसील (RBSE पुस्तक में बाड़मेर ज़िला) |
|---|---|
| परिवार | पिता अजमालजी तँवर, माता मैणादे; बड़े भाई वीरमदेव |
| पत्नी | नेतलदे, अमरकोट के दलजी सोढ़ा की पुत्री |
| गुरु | बालीनाथ |
| मुख्य स्थान | रामदेवरा (रूणीचा), पोकरण के निकट, जैसलमेर |
| समाधि | रामदेवरा में जीवित समाधि, भाद्रपद शुक्ल एकादशी; 1458 ई. (RBSE पुस्तक) |
| मेला | रामदेवरा में भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी; जनवरी-फरवरी में एक छोटा मेला भी |
| प्रतीक | पगल्ये; नेजा; समाधि पर कपड़े के घोड़े चढ़ाए जाते हैं |
| पंथ | कामड़िया पंथ की स्थापना |
| उपनाम | रामसा पीर, पीरों के पीर; श्रीकृष्ण के अवतार (हिंदू मान्यता) |
जीवन और लोक-कथा
RBSE पुस्तक के अनुसार रामदेवजी मल्लीनाथजी के समकालीन थे। बचपन में ही उन्हें मल्लीनाथजी से पोकरण क्षेत्र मिला, जहाँ उन्होंने भैरव नामक क्रूर व्यक्ति का अंत कर आतंक समाप्त किया। बाद में पोकरण अपनी भतीजी को दहेज में देकर उन्होंने रामदेवरा (रूणीचा) गाँव बसाया और वहीं जीवित समाधि ली।
वे वीर होने के साथ समाज-सुधारक भी थे और उन्होंने जाति प्रथा, मूर्तिपूजा और तीर्थयात्रा का विरोध किया। मेघवाल भक्त डाली बाई, जिन्हें उन्होंने बहन माना, ने उनसे एक दिन पहले समाधि ली (कला एवं संस्कृति विभाग)।
कथा है कि मक्का से पाँच पीर उनकी परीक्षा लेने आए और उनके चमत्कार देखकर उन्हें 'पीरों का पीर' माना।
पूजा और मेला
- रामदेवरा का बड़ा मेला भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक चलता है; लाखों लोग आते हैं और सांप्रदायिक सद्भाव इसकी मुख्य विशेषता है।
- वर्तमान समाधि-मंदिर बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने बनवाया (देवस्थान विभाग)।
- भक्त समाधि पर कपड़े के घोड़े चढ़ाते हैं।
- गाँवों में पेड़ के नीचे ऊँचे चबूतरे पर उनके पगल्ये स्थापित किए जाते हैं; ऐसा स्थान 'थान' कहलाता है।
गीत, नृत्य और वाद्य
- चौतारा: चार तारों वाला लोक वाद्य, जो रामदेवजी के भजनों में बजाया जाता है (RAS प्रारंभिक 2024)।
- तेरहताली: कामड़ समुदाय की महिलाएँ शरीर पर मंजीरे बाँधकर यह नृत्य करती हैं; कामड़िया पंथ के अनुयायी इसे रामदेवजी के मेले में प्रस्तुत करते हैं।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- तिथियों में अंतर है। RBSE पुस्तक समाधि 1458 ई. में बताती है। कला एवं संस्कृति विभाग जन्म चैत्र शुक्ल पंचमी, वि.सं. 1409 और समाधि वि.सं. 1442 बताता है। समाधि की तिथि भाद्रपद शुक्ल एकादशी पर दोनों सहमत हैं।
- नेजा और रिखिया रामदेवजी से जुड़े हैं, पाबूजी या तेजाजी से नहीं (प्रोटेक्शन ऑफिसर 2022)।
- जन्म ऊँडूकासमेर (शिव तहसील) में; समाधि और मेला रामदेवरा (जैसलमेर) में।
- गुरु बालीनाथ हैं, गोरखनाथ नहीं (वे गोगाजी के गुरु हैं)।
खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
आरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2024 · प्रश्न 128
लोक वाद्ययंत्र 'चौतारा' के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए एवं निम्नांकित में से सही विकल्प चुनिए : A. यह चार तारों वाला वाद्ययंत्र है । B. यह सामान्यतः रामदेवजी के भजन गाने में प्रयुक्त होता है ।
- (1)केवल A सत्य है ।
- (2)केवल B सत्य है ।
- (3)A और B दोनों सत्य हैं ।
- (4)A और B दोनों असत्य हैं ।
उत्तर देखें
✓ (3) A और B दोनों सत्य हैं ।
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसंरक्षण अधिकारी 2022 · प्रश्न 139
रिखिया एवं नेजा निम्नलिखित में से किस लोक देवता से संबंधित हैं ?
- (1)पाबूजी
- (2)तेजाजी
- (3)मल्लीनाथजी
- (4)रामदेवजी
उत्तर देखें
✓ (4) रामदेवजी
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