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पाबूजी

कोलू के पाबूजी राठौड़ ऊँटों के देवता के रूप में पूजे जाते हैं; उन्होंने देवल चारणी की गायों की रक्षा में प्राण दिए। उनकी फड़ राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध फड़ों में है।

⏱ 3 मिनट पढ़ें✓ तथ्य जाँचे गए 14 अक्टूबर 2026

विषय-सूची

एक नज़र में

  1. जन्म 1239 ई. में कोलू (फलौदी के निकट) में, धांधलजी राठौड़ के यहाँ (RBSE पुस्तक)।
  2. देवल चारणी की घोड़ी केसर कालमी पर सवार होकर जायल के जींदराव खींची से उसकी गायें छुड़ाने गए और 1276 ई. में वीरगति पाई (RBSE)।
  3. पत्नी: सुपियारदे, अमरकोट के सूरजमल सोढ़ा की पुत्री; गायों की रक्षा के लिए वे फेरों के बीच से ही चले गए।
  4. ऊँटों के देवता: मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊँट लाने का श्रेय पाबूजी को; लक्ष्मण के अवतार माने जाते हैं।
  5. प्रतीक: हाथ में भाला लिए अश्वारोही।
  6. कोलू में वार्षिक मेला; भोपे रावणहत्था पर 'पाबूजी की फड़' गाते हैं।
  7. पाबू प्रकाश के रचयिता मोडजी आशिया हैं। पाबूजी पंच पीरों में से एक हैं।

तथ्य

जन्मकोलू, फलौदी के निकट; 1239 ई. (RBSE पुस्तक)
पिताधांधलजी राठौड़
मातालोक-कथा के अनुसार अप्सरा; पालन कमलादे ने किया (कला एवं संस्कृति विभाग)
पत्नीसुपियारदे, अमरकोट के सूरजमल सोढ़ा की पुत्री
वाहनदेवल चारणी की घोड़ी केसर कालमी
वीरगति1276 ई. (RBSE), गायों की रक्षा में जायल के जींदराव खींची से युद्ध करते हुए
मुख्य स्थान और मेलाकोलू, जहाँ वार्षिक मेला लगता है
प्रतीकहाथ में भाला लिए अश्वारोही
भक्तरायका (रेबारी) ऊँट पालक; थोरी और भील समुदाय
उपनामऊँटों के देवता; लक्ष्मण के अवतार (लोक-मान्यता); पंच पीरों में से एक

जीवन और लोक-कथा

लोक-कथा के अनुसार पाबूजी अप्सरा के गर्भ से जन्मे और धांधलजी राठौड़ के घर कमलादे ने उनका पालन किया। अमरकोट के सूरजमल सोढ़ा की पुत्री से विवाह के बीच ही उनके प्रतिद्वंद्वी बहनोई, जायल के जींदराव खींची ने पुराने वैर के कारण देवल चारणी की गायें घेर लीं। देवल की प्रार्थना पर पाबूजी तीन फेरों के बाद ही उसकी घोड़ी केसर कालमी पर सवार होकर निकल पड़े और गायों की रक्षा करते हुए अनेक साथियों सहित वीरगति को प्राप्त हुए।

RBSE पुस्तक के अनुसार मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊँट लाने का श्रेय पाबूजी को है, इसीलिए वे ऊँटों के देवता के रूप में पूजे जाते हैं।

स्रोतों में वर्ष अलग-अलग हैं। RBSE पुस्तक के वर्ष याद रखें: जन्म 1239 ई., वीरगति 1276 ई.। कला एवं संस्कृति विभाग जन्म वि.सं. 1276 या 1299 बताता है, इसलिए दोनों '1276' को न मिलाएँ।

पूजा और मेला

  • मुख्य थान कोलू में है, जहाँ प्रतिवर्ष मेला लगता है।
  • ऊँट या गाय बीमार होने पर रायका (रेबारी) पशुपालक उनकी मनौती मानते हैं; बीमार ऊँट ठीक होने पर भोपे-भोपियाँ उनकी फड़ गाते हैं।
  • वे पंच पीरों में गिने जाते हैं।

फड़ और रावणहत्था

  • पाबूजी की फड़: उनके जीवन का पट-चित्र, जिसे नायक (थोरी) जाति के भोपे रात भर रावणहत्था पर गाते हैं और भोपी साथ में गाती है।
  • इसका चित्रांकन शाहपुरा (भीलवाड़ा) के छीपा जाति के जोशी चितेरे करते हैं।

साहित्य

  • पाबू प्रकाश: कवि मोडजी आशिया की रचना, जिसमें पाबूजी का जीवन वर्णित है।

याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं

  • फड़ और भोपा पाबूजी (और देवनारायणजी) से जुड़े हैं; नेजा और रिखिया रामदेवजी से।
  • पाबूजी का वाद्य रावणहत्था है; देवनारायणजी का जंतर।
  • ऊँटों के देवता = पाबूजी; सर्प देवता = गोगाजी और तेजाजी।
  • शत्रु जींदराव खींची था; गायें और घोड़ी देवल चारणी की थीं।
  • कोलू का मेला चैत्र में है; रामदेवरा, गोगा और तेजा के मेले भाद्रपद में।

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