एक नज़र में
- जन्म ददरेवा (चूरू) में; पिता जेवर चौहान, माता बाछल।
- गुरु गोरखनाथ; RBSE पुस्तक के अनुसार वे गोरखनाथ और महमूद गजनवी के समकालीन थे।
- जन्मस्थल ददरेवा 'शीर्ष मेड़ी' और समाधि स्थल गोगामेड़ी (नोहर, हनुमानगढ़) 'धुरमेड़ी' कहलाता है।
- गोगानवमी: भाद्रपद कृष्ण नवमी; गोगामेड़ी का मेला भाद्रपद में लगभग एक माह चलता है।
- उन्हें 'जाहरपीर' कहा जाता है; हिंदू 'नागराज' और मुसलमान 'गोगापीर' के रूप में पूजते हैं; मान्यता है कि इससे सर्पदंश का विष बेअसर होता है।
- गाँवों में उनके थान, सर्प-अंकित पत्थर, प्रायः खेजड़ी के नीचे होते हैं।
- पंच पीरों में से एक।
तथ्य
| जन्म स्थान | ददरेवा, चूरू (शीर्ष मेड़ी) |
|---|---|
| माता-पिता | जेवर (जेवरसिंह) चौहान और बाछल |
| पत्नी | केलमदे (कला एवं संस्कृति विभाग) |
| गुरु | गोरखनाथ |
| समाधि | गोगामेड़ी (धुरमेड़ी), नोहर तहसील, हनुमानगढ़ |
| मेला | गोगानवमी, भाद्रपद कृष्ण नवमी; गोगामेड़ी का मेला भाद्रपद में लगभग एक माह |
| समुदाय | चौहान राजपूत; हिंदू और मुसलमान दोनों पूजते हैं |
| वाहन और प्रतीक | नीला घोड़ा; सर्प; भाला लिए अश्वारोही |
| उपनाम | जाहरपीर, जाहरवीर, गोगापीर, नागराज; सर्प देवता |
जीवन और लोक-कथा
RBSE पुस्तक के अनुसार गोगाजी गोरखनाथ और महमूद गजनवी के समकालीन थे। मौसेरे भाइयों अरजन-सुर्जन से उनका संपत्ति-विवाद था; अरजन-सुर्जन मुसलमानों की फौज लाकर उनकी गायें घेर लाए और भीषण युद्ध में अरजन-सुर्जन के साथ गोगाजी भी वीरगति को प्राप्त हुए।
कला एवं संस्कृति विभाग की सामग्री में एक अन्य परंपरा है: जन्म वि.सं. 1003 में; उन्होंने महमूद गजनवी की सेना को सोमनाथ जाने का मार्ग नहीं दिया और वृद्धावस्था में वि.सं. 1081 (1024 ई.) में उससे लड़ते हुए वीरगति पाई। दोनों को परंपराएँ ही मानें।
जन्मस्थल ददरेवा 'शीर्ष मेड़ी' और समाधि स्थल 'धुरमेड़ी' (गोगामेड़ी) कहलाता है।
पूजा और मेला
- गोगानवमी (भाद्रपद कृष्ण नवमी) गोगामेड़ी और पूरे राजस्थान में मनाई जाती है; गोगामेड़ी का मेला भाद्रपद में लगभग एक माह चलता है और पंजाब, हरियाणा से भी श्रद्धालु आते हैं।
- बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने 26 जून 1911 को गोगामेड़ी मंदिर का जीर्णोद्धार कराया (देवस्थान विभाग)।
- गर्भगृह में एक दीपक के पास चायल मुसलमान और दूसरे के पास ब्राह्मण खड़े रहते हैं; कला एवं संस्कृति विभाग चायल मुसलमानों को यहाँ का पुजारी बताता है।
- पूजा भाला लिए अश्वारोही या सर्प के प्रतीक के रूप में होती है; गाँवों में उनका सर्प-अंकित पत्थर प्रायः खेजड़ी के नीचे होता है।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- ददरेवा (चूरू)जन्मस्थल, शीर्ष मेड़ी। गोगामेड़ी (हनुमानगढ़): समाधि, धुरमेड़ी और मेला।
- गोगाजी (भाद्रपद कृष्ण नवमी) और तेजाजी (भाद्रपद शुक्ल दशमी) दोनों सर्प देवता हैं; तिथियाँ भिन्न हैं।
- गोगाजी पंच पीरों में हैं; तेजाजी नहीं।
- गोगाजी के गुरु गोरखनाथ हैं; रामदेवजी और हड़बूजी के बालीनाथ।
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