एक नज़र में
- प्रकार: धान्वन (मरुस्थलीय) दुर्ग, और चारों ओर के परकोटे के कारण पारिध दुर्ग।
- कहावत: पत्थर के पैर, लोहे का शरीर और काठ के घोड़े पर सवार होकर ही जैसलमेर पहुँचा जा सकता है।
- निर्माण: चूने के बिना बड़े-बड़े पीले पत्थर जोड़कर बना; दूर से लंगर डाले जहाज़ जैसा दिखता है।
तथ्य
| स्थान | जैसलमेर, त्रिकूट पहाड़ी पर |
|---|---|
| नाम | सोनार किला, स्वर्ण दुर्ग, पीले बलुआ पत्थर के रंग के कारण |
| निर्माता | भाटी शासक रावल जैसल; 1155 ई. (कुछ विवरणों में 1156) |
| बुर्ज | 99 |
| जीवित किला | पुराने शहर की लगभग एक-चौथाई आबादी भीतर रहती है; दुकानें, हवेलियाँ और मंदिर भी हैं |
दुर्ग के भीतर
- जैन मंदिर: पीले बलुआ पत्थर के सात, 12वीं से 16वीं सदी के, जिनमें ऋषभदेव, पार्श्वनाथ और संभवनाथ के मंदिर हैं।
- महल: रंग महल, मोती महल, गज विलास और जवाहर विलास।
- दुर्लभ प्राचीन पांडुलिपियों का संग्रह।
फिल्म और साहित्य में
सत्यजित राय ने फेलूदा की कहानी 'सोनार केल्ला' इसी दुर्ग पर लिखी और यहीं उसकी फिल्म बनाई।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- सोनार किला या सोनार केल्लासोनार किला दुर्ग है · सोनार केल्ला सत्यजित राय की उस पर आधारित कहानी और फिल्म है।
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