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आमेर दुर्ग

आमेर दुर्ग, जिसे आम्बेर भी लिखा जाता है, जयपुर से पहले कछवाहों की पहाड़ी राजधानी था।

⏱ 1 मिनट पढ़ें✓ तथ्य जाँचे गए 15 अक्टूबर 2026

विषय-सूची

एक नज़र में

  1. राजधानी: सवाई जयसिंह द्वितीय के राजधानी जयपुर ले जाने तक कछवाहे आमेर से शासन करते थे; कारण बढ़ती आबादी और पानी की कमी बताए गए।
  2. कछवाहों से पहले: आमेर पर मीणा सरदारों का अधिकार था।
  3. धरोहर: यूनेस्को के छह पहाड़ी दुर्गों में से एक (2013)।

तथ्य

स्थानआमेर, जयपुर से लगभग 11 किमी, मावठा झील के ऊपर पहाड़ी पर
निर्मातामानसिंह प्रथम ने 1592 में महल शुरू करवाया; मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने पूरा करवाया
शैलीहिंदू और मुगल शैलियों का मिश्रण, लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से

दुर्ग के भीतर

  • सूरज पोल: मुख्य प्रवेश-द्वार।
  • जलेब चौक: वह आँगन जहाँ सैनिक इकट्ठा होते और सेनाएँ युद्ध में मिला सामान दिखाती थीं।
  • दीवान-ए-आम: जनता से मिलने का सभा-भवन।
  • सुख निवास: चंदन के दरवाज़े वाला भवन, जिसे नाली में बहते पानी से ठंडा रखा जाता था।
  • शीश महल (जय मंदिर): दीवारों और छतों पर दर्पण जड़े हैं।

याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं

  • आमेर या आम्बेरएक ही दुर्ग, दो वर्तनी।
  • आमेर या जयगढ़जयगढ़ पास का दुर्ग है, जहाँ जयबाण तोप है।

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