एक नज़र में
- राजधानी: सवाई जयसिंह द्वितीय के राजधानी जयपुर ले जाने तक कछवाहे आमेर से शासन करते थे; कारण बढ़ती आबादी और पानी की कमी बताए गए।
- कछवाहों से पहले: आमेर पर मीणा सरदारों का अधिकार था।
- धरोहर: यूनेस्को के छह पहाड़ी दुर्गों में से एक (2013)।
तथ्य
| स्थान | आमेर, जयपुर से लगभग 11 किमी, मावठा झील के ऊपर पहाड़ी पर |
|---|---|
| निर्माता | मानसिंह प्रथम ने 1592 में महल शुरू करवाया; मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने पूरा करवाया |
| शैली | हिंदू और मुगल शैलियों का मिश्रण, लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से |
दुर्ग के भीतर
- सूरज पोल: मुख्य प्रवेश-द्वार।
- जलेब चौक: वह आँगन जहाँ सैनिक इकट्ठा होते और सेनाएँ युद्ध में मिला सामान दिखाती थीं।
- दीवान-ए-आम: जनता से मिलने का सभा-भवन।
- सुख निवास: चंदन के दरवाज़े वाला भवन, जिसे नाली में बहते पानी से ठंडा रखा जाता था।
- शीश महल (जय मंदिर): दीवारों और छतों पर दर्पण जड़े हैं।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- आमेर या आम्बेरएक ही दुर्ग, दो वर्तनी।
- आमेर या जयगढ़जयगढ़ पास का दुर्ग है, जहाँ जयबाण तोप है।
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