एक नज़र में
- 1301: हम्मीर देव चौहान ने अलाउद्दीन खिलजी की सेना के विद्रोही मंगोलों को शरण दी थी और उन्हें सौंपने से मना किया; वे लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और उनके परिवार की स्त्रियों ने जौहर किया।
- प्रकार: इसमें गिरि दुर्ग और वन दुर्ग दोनों की विशेषताएँ हैं।
- अबुल फज़ल ने इसे 'बख्तरबंद' दुर्ग कहा।
तथ्य
| स्थान | सवाई माधोपुर के पास, रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान के भीतर |
|---|---|
| निर्माता | अजमेर के चौहान: RBSE पुस्तक में 8वीं सदी (एक मान्यता के अनुसार रणथान देव चौहान); अन्य विवरणों में 10वीं सदी का मध्य |
दुर्ग के भीतर
- हम्मीर महल, रानी महल, हम्मीर की कचहरी, सुपारी महल और जोगी महल।
- 32 खंभों की छतरी।
- त्रिनेत्र गणेश मंदिर और पीर सदरुद्दीन की दरगाह।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- अलाउद्दीन के घेरेरणथंभौर 1301, हम्मीर देव · चित्तौड़गढ़ 1303, रतनसिंह।
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