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परंपरागत जल-संरक्षण

पश्चिमी राजस्थान के गाँव वर्षा-जल को खड़ीन, नाडी, टांकों और कुंडों में सहेजते थे; अलवर के गाँव जोहड़ों में।

⏱ 1 मिनट पढ़ें✓ तथ्य जाँचे गए 15 अक्टूबर 2026

विषय-सूची

एक नज़र में

  1. खड़ीन नमी से खेती: पानी उतरने के बाद गीली मिट्टी में गेहूँ या चना बोया जाता है, जो बिना सिंचाई के पक जाता है।
  2. मौसम: खड़ीन का पानी लगभग नवंबर तक ज़मीन में समा जाता है या निकाल दिया जाता है, फिर रबी की बुवाई होती है।
  3. जोहड़ों का पुनर्जीवन: 1985 से राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में तरुण भारत संघ ने अलवर में जोहड़ फिर से बनवाए।

खड़ीन

क्या हैपथरीली ढलान के निचले भाग में बना लंबा मिट्टी का बाँध; वर्षा का बहता पानी इसके पीछे के खेत में रुकता है और अतिरिक्त पानी निकास से बाहर जाता है
किसने विकसित कीपालीवाल ब्राह्मणों ने, सदियों पहले

नाडी, टांका, कुंड और जोहड़

संरचनाक्या है
नाडीखोदकर या मेड़ बनाकर बना गाँव का तालाब, जिसमें मनुष्यों और पशुओं के लिए वर्षा-जल रुकता है
टांकाढका हुआ भूमिगत हौज, जिसमें साफ जलग्रहण क्षेत्र से वर्षा-जल पीने के लिए जमा होता है; जयगढ़ जैसे किलों में बड़े टांके हैं
कुंड (कुंडी)तश्तरीनुमा जलग्रहण क्षेत्र (आगोर) के बीच बना गोल भूमिगत कुआँ, पीने के पानी के लिए
जोहड़ढलान पर बना छोटा मिट्टी का बाँध या तालाब, जो वर्षा-जल रोककर भूजल बढ़ाता है

याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं

  • खड़ीनयह जैसलमेर जिले से जुड़ी है, नागौर, बीकानेर या पाली से नहीं।
  • खड़ीन या टांकाखड़ीन खेत में फसल के लिए नमी देती है · टांका पीने का पानी जमा करता है।

खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न

आरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2024 · प्रश्न 8

राजस्थान के किस जिले में 'खड़ीन' जल संरक्षण की प्रचलित विधि है ?

  1. (1)नागौर
  2. (2)बीकानेर
  3. (3)जैसलमेर
  4. (4)पाली
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