एक नज़र में
- खड़ीन नमी से खेती: पानी उतरने के बाद गीली मिट्टी में गेहूँ या चना बोया जाता है, जो बिना सिंचाई के पक जाता है।
- मौसम: खड़ीन का पानी लगभग नवंबर तक ज़मीन में समा जाता है या निकाल दिया जाता है, फिर रबी की बुवाई होती है।
- जोहड़ों का पुनर्जीवन: 1985 से राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में तरुण भारत संघ ने अलवर में जोहड़ फिर से बनवाए।
खड़ीन
| क्या है | पथरीली ढलान के निचले भाग में बना लंबा मिट्टी का बाँध; वर्षा का बहता पानी इसके पीछे के खेत में रुकता है और अतिरिक्त पानी निकास से बाहर जाता है |
|---|---|
| किसने विकसित की | पालीवाल ब्राह्मणों ने, सदियों पहले |
नाडी, टांका, कुंड और जोहड़
| संरचना | क्या है |
|---|---|
| नाडी | खोदकर या मेड़ बनाकर बना गाँव का तालाब, जिसमें मनुष्यों और पशुओं के लिए वर्षा-जल रुकता है |
| टांका | ढका हुआ भूमिगत हौज, जिसमें साफ जलग्रहण क्षेत्र से वर्षा-जल पीने के लिए जमा होता है; जयगढ़ जैसे किलों में बड़े टांके हैं |
| कुंड (कुंडी) | तश्तरीनुमा जलग्रहण क्षेत्र (आगोर) के बीच बना गोल भूमिगत कुआँ, पीने के पानी के लिए |
| जोहड़ | ढलान पर बना छोटा मिट्टी का बाँध या तालाब, जो वर्षा-जल रोककर भूजल बढ़ाता है |
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- खड़ीनयह जैसलमेर जिले से जुड़ी है, नागौर, बीकानेर या पाली से नहीं।
- खड़ीन या टांकाखड़ीन खेत में फसल के लिए नमी देती है · टांका पीने का पानी जमा करता है।
खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
आरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2024 · प्रश्न 8
राजस्थान के किस जिले में 'खड़ीन' जल संरक्षण की प्रचलित विधि है ?
- (1)नागौर
- (2)बीकानेर
- (3)जैसलमेर
- (4)पाली
उत्तर देखें
✓ (3) जैसलमेर
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