एक नज़र में
- पाठ्यक्रम में नाम: स्कूल व्याख्याता और टीचिंग एसोसिएट पाठ्यक्रमों में मालदेव मुस्लिम शक्ति का प्रतिरोध करने वाले शासकों में गिने गए हैं।
- गांगा की मृत्यु: गांगा महल के झरोखे से गिरे; ओझा लिखते हैं कि मालदेव ने उन्हें धक्का दिया, रेऊ इसे दुर्घटना बताते हैं।
- हुमायूँ: शेरशाह से हारने के बाद हुमायूँ ने मालदेव से सहायता चाही, पर मारवाड़ छोड़कर चला गया।
तथ्य
| पिता | राव गांगा |
|---|---|
| राज्यारोहण | RBSE पुस्तक में 1531; रेऊ के अनुसार 5 जून 1531 (वि.सं. 1588 आषाढ़ वदि 5); ओझा गांगा की मृत्यु, अतः राज्यारोहण, 1532 में बताते हैं |
| मृत्यु | 1562 |
| पुत्र | राम (ज्येष्ठ), उदयसिंह और चन्द्रसेन आदि; चन्द्रसेन उत्तराधिकारी बने |
युद्ध
- खानवा, 1527: पिता के शासनकाल में राणा सांगा की ओर से लड़े (मेवाड़ पृष्ठ)।
- मेड़ता: मेड़ता के वीरमदेव को निकाला, जो शेरशाह के पास चले गए।
- बीकानेर: उनकी सेना ने साहेबा (1541 या 1542; राठौड़ पृष्ठ देखें) में राव जैतसी को मारा और बीकानेर लिया। जैतसी के मंत्री नगराज सहायता के लिए शेरशाह के पास गए थे।
- गिरि-सुमेल, जनवरी 1544: शेरशाह के जाली पत्रों से मालदेव को अपने सरदारों पर संदेह हुआ; वे पीछे हटे और सेनापति जैता व कुम्पा लड़ते हुए मारे गए। शेरशाह ने कहा कि मुट्ठी भर बाजरे के लिए वह हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता। इसके बाद शेरशाह ने जोधपुर लिया।
- शेरशाह की मृत्यु (1545) के बाद मालदेव ने जोधपुर और मारवाड़ का बड़ा भाग फिर जीता।
- हरमाड़ा (अजमेर के पास), वि.सं. 1612 फाल्गुन वदि 9 (24 जनवरी 1557): हाजी खाँ की सहायता को भेजी गई उनकी सेना ने मेवाड़ के राणा उदयसिंह की सेना को हराया।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- मालदेव, चन्द्रसेनमालदेव ने जोधपुर शेरशाह के हाथों खोया (1544) · उनके पुत्र चन्द्रसेन ने अकबर की सेना के हाथों।
- जैता और कुम्पागिरि-सुमेल में मालदेव के सेनापति · चित्तौड़ (1567–68) के जयमल और फत्ता नहीं।
पढ़ लिया? अब अभ्यास करें
निःशुल्क अभ्यास प्रश्नों से इस विषय पर अपनी तैयारी जाँचें।
अभ्यास प्रश्न →