एक नज़र में
- पाठ्यक्रम में नाम: स्कूल व्याख्याता और टीचिंग एसोसिएट पाठ्यक्रमों में चन्द्रसेन का नाम है।
- उपनाम: 'मारवाड़ का प्रताप' और 'भूला-बिसरा नायक'; विश्वेश्वरनाथ रेऊ ने उनकी तुलना प्रताप से की, जिन्होंने भी मुगल अधीनता नहीं मानी और लगभग दस वर्ष बाद उन्हीं का मार्ग अपनाया।
- उनके बाद: RBSE के अनुसार 1581 से 1583 तक मारवाड़ मुगल खालसा रहा; रेऊ के अनुसार बचा हुआ राज्य उनके पुत्रों के पास रहा, पुत्र रायसिंह के पास 1583 तक।
तथ्य
| पिता | राव मालदेव |
|---|---|
| शासनकाल | 1562–1581; बड़े भाइयों राम और उदयसिंह की जगह उत्तराधिकारी बने (रेऊ रायमल का नाम भी देते हैं) |
| मृत्यु | 11 जनवरी 1581 (वि.सं. 1637 माघ सुदि 7), सारण की पहाड़ियों में सचियाय में |
घटनाक्रम
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1562 | भाई उदयसिंह को लोहावट (तब जोधपुर जिला, अब फलोदी) में हराया |
| 1563 | भाई राम को नाडोल में हराया |
| 1564 (रेऊ में उद्धृत ख्यातें: 1565) | अकबर के सेनापति हुसैन कुली खाँ ने जोधपुर ले लिया |
| 1570 | अकबर के नागौर दरबार में गए, पर अधीनता स्वीकार किए बिना लौट आए |
| 1570 के बाद | भाद्राजूण में डटे रहे, फिर सिवाना को केंद्र बनाया |
| 1576 | मुगल सेना ने सिवाना ले लिया |
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- चन्द्रसेन, उदयसिंहचन्द्रसेन ने मुगलों का प्रतिरोध किया · उनके भाई मोटा राजा उदयसिंह को अकबर से मारवाड़ मिला (1583)।
- चन्द्रसेन, रायसिंहमारवाड़ के चन्द्रसेन ने अकबर की अधीनता नहीं मानी · बीकानेर के रायसिंह को अकबर ने जोधपुर का प्रशासक बनाया (1572)।
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