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राव चन्द्रसेन

जोधपुर मुगलों के हाथ जाने के बाद भी चन्द्रसेन पहाड़ों से अकबर की सेना से लड़ते रहे; उनकी तुलना अक्सर महाराणा प्रताप से होती है।

⏱ 1 मिनट पढ़ें✓ तथ्य जाँचे गए 16 अक्टूबर 2026

विषय-सूची

एक नज़र में

  1. पाठ्यक्रम में नाम: स्कूल व्याख्याता और टीचिंग एसोसिएट पाठ्यक्रमों में चन्द्रसेन का नाम है।
  2. उपनाम: 'मारवाड़ का प्रताप' और 'भूला-बिसरा नायक'; विश्वेश्वरनाथ रेऊ ने उनकी तुलना प्रताप से की, जिन्होंने भी मुगल अधीनता नहीं मानी और लगभग दस वर्ष बाद उन्हीं का मार्ग अपनाया।
  3. उनके बाद: RBSE के अनुसार 1581 से 1583 तक मारवाड़ मुगल खालसा रहा; रेऊ के अनुसार बचा हुआ राज्य उनके पुत्रों के पास रहा, पुत्र रायसिंह के पास 1583 तक।

तथ्य

पिताराव मालदेव
शासनकाल1562–1581; बड़े भाइयों राम और उदयसिंह की जगह उत्तराधिकारी बने (रेऊ रायमल का नाम भी देते हैं)
मृत्यु11 जनवरी 1581 (वि.सं. 1637 माघ सुदि 7), सारण की पहाड़ियों में सचियाय में

घटनाक्रम

वर्षघटना
1562भाई उदयसिंह को लोहावट (तब जोधपुर जिला, अब फलोदी) में हराया
1563भाई राम को नाडोल में हराया
1564 (रेऊ में उद्धृत ख्यातें: 1565)अकबर के सेनापति हुसैन कुली खाँ ने जोधपुर ले लिया
1570अकबर के नागौर दरबार में गए, पर अधीनता स्वीकार किए बिना लौट आए
1570 के बादभाद्राजूण में डटे रहे, फिर सिवाना को केंद्र बनाया
1576मुगल सेना ने सिवाना ले लिया

याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं

  • चन्द्रसेन, उदयसिंहचन्द्रसेन ने मुगलों का प्रतिरोध किया · उनके भाई मोटा राजा उदयसिंह को अकबर से मारवाड़ मिला (1583)।
  • चन्द्रसेन, रायसिंहमारवाड़ के चन्द्रसेन ने अकबर की अधीनता नहीं मानी · बीकानेर के रायसिंह को अकबर ने जोधपुर का प्रशासक बनाया (1572)।

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