एक नज़र में
- बीकानेर की कुलदेवी: परंपरा के अनुसार राव बीका ने राजगद्दी पर बैठने से पहले उनका आशीर्वाद पाया; तभी से वे बीकानेर के राठौड़ शासकों की कुलदेवी हैं।
- काबा: मंदिर के चूहे काबा कहलाते हैं; इन्हें मारना या पकड़ना वर्जित है और सफेद काबा के दर्शन शुभ माने जाते हैं।
- परंपरा के अनुसार मेहरानगढ़ (जोधपुर) और बीकानेर के दुर्ग की नींव करणी माता ने रखी।
तथ्य
| जन्म | वि.सं. 1444, आश्विन शुक्ल सप्तमी (20 सितंबर 1387 ई.), फलौदी के निकट सुवाप गाँव में (तब जोधपुर जिला, अब फलौदी) |
|---|---|
| माता-पिता | मेहाजी किनिया और देवल बाई; बचपन का नाम रिधुबाई |
| पति | देपाजी |
| देहावसान | वि.सं. 1595, चैत्र शुक्ल नवमी |
| मंदिर | देशनोक, बीकानेर से लगभग 33 से 35 किमी; शाक्त परंपरा। निर्माण कई चरणों में हुआ: महाराजा सूरतसिंह ने परकोटा और मुख्य प्रवेश द्वार बनवाया, महाराजा गंगासिंह ने इसे कलात्मक स्वरूप दिया |
| पुजारी | देपाजी के वंशज देपावत, जो मासिक बारी से सेवा करते हैं |
| मेले | आश्विन (बड़ा मेला) और चैत्र (छोटा मेला) के नवरात्रों में |
जीवन और परंपरा
- कहा जाता है कि हुमायूँ के भाई कामरान ने भटनेर पर आक्रमण किया, तब बीकानेर के राव जैतसी ने देशनोक जाकर करणी माता का आशीर्वाद लिया और विजय पाई।
- मान्यता है कि करणी माता की कृपा से औरंगजेब की सेना बिना आक्रमण किए बीकानेर से लौट गई।
देशनोक के चूहे
- मान्यता है कि ये चूहे पुनर्जन्म लेने वाले चारण हैं।
- श्रद्धालु इन्हें दूध और लड्डू खिलाते हैं।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- चारण या नाईकरणी माता चारणों की कुलदेवी हैं · नारायणी माता नाई समाज की।
खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
समान पात्रता परीक्षा (स्नातक स्तर) 2022 · प्रश्न 24
सुमेलित कीजिए – कुलदेवी — जाति (1) करणी माता — (i) नाई (2) सकराय माता — (ii) सीरवी (3) आई माता — (iii) खण्डेलवाल (4) नारायणी माता — (iv) चारण
- (1)1-iv, 2-i, 3-ii, 4-iii
- (2)1-ii, 2-i, 3-iv,4-iii
- (3)1-iv, 2-iii, 3-ii, 4-i
- (4)1-iv, 2-iii, 3-i, 4-ii
उत्तर देखें
✓ (3) 1-iv, 2-iii, 3-ii, 4-i
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