एक नज़र में
- कुंवारी कन्याएँ अच्छे वर के लिए और विवाहित महिलाएँ पति की लंबी आयु के लिए पूजा करती हैं।
- महिलाएँ हाथों-पैरों में मेहंदी रचाती हैं।
- अंतिम दिन प्रतिमाओं की शोभायात्रा निकलती है और उन्हें झील, तालाब या कुएँ में विसर्जित किया जाता है।
तथ्य
| समय | चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (होली के अगले दिन) से चैत्र शुक्ल तृतीया तक; राजस्थान पर्यटन के अनुसार 18 दिन, कई विवरणों में 16 दिन की पूजा |
|---|---|
| पूजा | गौरी (पार्वती) और ईसर (शिव) की मिट्टी की प्रतिमाएँ, जिन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं |
प्रमुख स्थान
- जयपुर: गणगौर की सवारी सिटी पैलेस से त्रिपोलिया गेट होकर हाथी-घोड़ों के साथ निकलती है और तालकटोरा के पास संपन्न होती है।
- उदयपुर: प्रतिमाएँ पिछोला झील के गणगौर घाट पर विसर्जित होती हैं और उसी समय मेवाड़ महोत्सव होता है।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- गणगौर या तीजगणगौर होली के बाद चैत्र में आता है · तीज श्रावण-भाद्रपद का वर्षा ऋतु का पर्व है।
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