एक नज़र में
- इसे आदिवासियों का कुंभ कहा जाता है।
- परीक्षा की दृष्टि से: मेले के संत मावजी हैं, जिन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है, जबकि मुख्य मंदिर शिव का है।
- अनेक आदिवासी परिवार यहाँ अपने दिवंगत परिजनों की अस्थियाँ विसर्जित करते हैं।
तथ्य
| स्थान | बेणेश्वर धाम, डूंगरपुर; सोम और माही के संगम पर बने टापू पर (कुछ विवरणों में जाखम भी) |
|---|---|
| समय | माघ शुक्ल एकादशी से माघ पूर्णिमा (जनवरी–फरवरी); मुख्य दिन माघ पूर्णिमा |
| मंदिर | बेणेश्वर महादेव (शिवलिंग); निकट ही विष्णु मंदिर, जिसे 1793 ई. में मावजी की पुत्रवधू जनकुंवरी ने बनवाया |
मेले में
- मुख्य दिन बेणेश्वर धाम के महंत की पालकी शोभायात्रा निकलती है।
- आदिवासियों की रंग-बिरंगी वेशभूषा, आभूषण और लोक नृत्य मेले का मुख्य आकर्षण हैं।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- आदिवासी मेलेबेणेश्वर (डूंगरपुर, माघ पूर्णिमा) · सीताबाड़ी (बारां, सहरिया, ज्येष्ठ अमावस्या)।
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