एक नज़र में
- जयपुर और 1844: सती विधेयक, समाधि रोकने का पहला प्रयास, त्याग पर रोक और कन्या वध को अनुचित घोषित करना, सभी 1844 में (एक अध्ययन कन्या वध के लिए 1843 देता है)।
- जौहर और सती में अंतर: जौहर युद्ध में पराजय निश्चित होने पर राजपूत स्त्रियों का सामूहिक अग्नि-स्नान · सती पति की चिता पर विधवा का जलना।
- कुप्रथाएँ: डाकन, स्त्रियों को डायन बताकर यातना देना या मार डालना · कन्या वध, जन्म लेते ही कन्या को मारना · त्याग, राजपूत कन्या के विवाह पर चारण, भाट आदि को दिया जाने वाला दान · समाधि, भूमि में जीवित गड़कर या जल में डूबकर प्राण त्यागना।
तथ्य
| रूप कँवर सती कांड | 4 सितम्बर 1987, देवराला गाँव, सीकर जिला |
|---|---|
| इसके बाद के कानून | 1987 में राजस्थान का सती निवारण कानून, फिर केन्द्र का सती (निवारण) आयोग अधिनियम, 1987 (1988 का अधिनियम संख्या 3) |
| डायन-प्रताड़ना कानून | राजस्थान डायन-प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2015 (2015 का अधिनियम संख्या 14); राज्यपाल की स्वीकृति 24 अप्रैल 2015 |
सती: राज्यवार रोक
| वर्ष | राज्य या शासन | विवरण |
|---|---|---|
| 1822 | बूँदी | अनेक परीक्षा-पुस्तकें इसे सती को गैर-कानूनी घोषित करने वाली राजस्थान की पहली रियासत बताती हैं; RBSE पुस्तक में यह नहीं है |
| 1829 | लॉर्ड विलियम बैंटिक | 4 दिसम्बर 1829 के बंगाल रेगुलेशन XVII से ब्रिटिश भारत में सती गैर-कानूनी |
| 1830 | अलवर | उन्हीं पुस्तकों के अनुसार 1829 के कानून के बाद रोक लगाने वाली पहली रियासत |
| 1844 | जयपुर | 1839 में पोलिटिकल एजेन्ट की अध्यक्षता में बनी जयपुर संरक्षक समिति ने सती उन्मूलन का विधेयक पारित किया, जो प्रथम वैधानिक प्रयास था; इसके बाद ए.जी.जी. ने पोलिटिकल एजेन्टों से अन्य शासकों पर प्रभाव डालने को कहा |
| 1846 | डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ | सती को विधि-सम्मत नहीं माना |
| 1848 | कोटा, जोधपुर | अन्य पुस्तकें कोटा के लिए 1862 और जोधपुर के लिए 1860 देती हैं |
| 1860 | मेवाड़ | अनेक प्रयासों के बाद कानून, उल्लंघन पर जुर्माना; अन्य पुस्तकें 1861 देती हैं |
| 1861 | ब्रिटिश अधिकारी | कठोर नियम: सती की सूचना पर कारावास, जुर्माने के साथ शासक को पद से हटाना और गाँव को खालसा करना; लापरवाह शासकों की तोपों की सलामी घटाना |
अन्य कुप्रथाएँ और उनके विरुद्ध कानून
| कुप्रथा | वर्ष, राज्य या कानून | विवरण |
|---|---|---|
| डाकन प्रथा | मेवाड़, 1853 | तब मेवाड़ में महाराणा स्वरूप सिंह (1842–61) का शासन था; RBSE पुस्तक मेवाड़ रेजीडेन्ट कर्नल ईडन के परामर्श पर महाराणा जवान सिंह का नाम देती है, जिनकी मृत्यु 1838 में हो चुकी थी; अन्य पुस्तकें मेवाड़ भील कोर के कमांडेंट जे.सी. ब्रुक को श्रेय देती हैं |
| कन्या वध | पहले मेवाड़, फिर कोटा; जोधपुर के नियम 1839; जयपुर 1844 | RBSE कक्षा 7 की पुस्तक व अनेक अन्य पुस्तकें कोटा को पहला मानती हैं, 1833 में (कुछ 1834), फिर बूँदी 1834, बीकानेर 1837 और उदयपुर 1844; कर्नल जेम्स टॉड ने दहेज को प्रमुख कारण माना; 1888 के बाद घटनाएँ लगभग समाप्त |
| त्याग प्रथा | जोधपुर 1841; बीकानेर और जयपुर 1844 | |
| समाधि प्रथा | जयपुर 1844; 1861 का अधिनियम | पोलिटिकल एजेन्ट लुडलो के प्रयासों से पहला प्रयास |
| दास प्रथा | कोटा, 1832 | रोक लगाने वाली राजस्थान की पहली रियासत मानी जाती है; ब्रिटिश भारत के लिए RBSE कक्षा 7 की पुस्तक 1833 के चार्टर अधिनियम का उल्लेख करती है |
| बाल एवं अनमेल विवाह | अलवर, 10 दिसम्बर 1903 | RBSE पुस्तक अलवर के कानून को पहला मानती है; अन्य पुस्तकें 1885 में जोधपुर का नाम देती हैं, जहाँ प्रधानमंत्री सर प्रताप सिंह ने यह रोक लगवाई |
| शारदा अधिनियम | 28 सितम्बर 1929 को पारित, 1 अप्रैल 1930 से लागू | अजमेर के हरबिलास शारदा के नाम पर; न्यूनतम आयु लड़की 14 और लड़का 18 वर्ष, 1978 में 18 और 21 वर्ष; इसकी जगह बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 |
| विधवा पुनर्विवाह | 1856 का अधिनियम XV | 26 जुलाई 1856 को लॉर्ड कैनिंग के समय लागू; ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अभियान चलाया |
| दहेज | दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 | केन्द्रीय कानून, 1 जुलाई 1961 से लागू |
| सागड़ी (बंधुआ मजदूरी) | राजस्थान सागड़ी प्रथा उन्मूलन अधिनियम, 1961 | |
| मृत्युभोज | राजस्थान मृत्युभोज निवारण अधिनियम, 1960 | 1960 का अधिनियम संख्या 1 |
सुधार सभाएँ
| सभा | स्थापना | उद्देश्य और कार्य |
|---|---|---|
| देश हितेषिणी सभा | उदयपुर (मेवाड़), 2 जुलाई 1877 | राजपूतों में विवाह खर्च सीमित करना और बहुविवाह के विरुद्ध नियम बनाना; इसका उल्लेख करने वाले कवि श्यामलदास (वीर विनोद) स्वयं इसके सदस्य थे; यह मेवाड़ तक सीमित रही |
| वाल्टरकृत राजपूत हितकारिणी सभा | प्रथम सम्मेलन अजमेर, 10 मार्च 1888; नाम जनवरी 1889 में | 1887 से ए.जी.जी. कर्नल सी.के.एम. वाल्टर के प्रयास से; उद्देश्य: बहुविवाह की समाप्ति, विवाह आयु लड़की कम से कम 14 और लड़का 18 वर्ष, टीका और रीत पर रोक, विवाह और मृत्युभोज के खर्च पर नियंत्रण |
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- डाकन या डायनडाकन पर रोक 1853 (मेवाड़) · डायन-प्रताड़ना निवारण अधिनियम 2015।
- विवाह आयुवाल्टर सभा के नियमों और 1929 के शारदा अधिनियम में 14 और 18 · 1978 के बाद 18 और 21।
खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
संरक्षण अधिकारी 2024 · प्रश्न 18
'समाधि' लेने की कुप्रथा रोकने का सर्वप्रथम प्रयास किस राज्य ने किया?
- (1)जोधपुर
- (2)उदयपुर
- (3)जयपुर
- (4)कोटा
उत्तर देखें
✓ (3) जयपुर
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसमान पात्रता परीक्षा (स्नातक स्तर) 2022 · प्रश्न 4
भारत के किस गवर्नर जनरल के कार्यकाल के दौरान, हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया गया था?
- (1)लॉर्ड एमहर्स्ट
- (2)लॉर्ड एलनबरो
- (3)लॉर्ड कैनिंग
- (4)लॉर्ड मेयो
उत्तर देखें
✓ (3) लॉर्ड कैनिंग
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसमान पात्रता परीक्षा (स्नातक स्तर) 2022 · प्रश्न 8
अधोलिखित कथनों को सावधानीपूर्वक पढ़िए – (i) 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में, मेवाड़ में देश हितेषिणी सभा की स्थापना की गयी। (ii) सभा का मुख्य उद्देश्य समाज सुधार था। सही कूट चुनिए –
- (1)केवल कथन (i) सत्य है
- (2)केवल कथन (ii) सत्य है
- (3)न तो (i) ना ही (ii) सत्य है
- (4)दोनों कथन सत्य हैं
उत्तर देखें
✓ (4) दोनों कथन सत्य हैं
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंआरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2024 · प्रश्न 126
वाल्टरकृत राजपूत हितकारिणी सभा के संबंध में निम्न में से कौन सा कथन असत्य है ?
- (1)इसकी स्थापना सन् 1888 में कर्नल सी.के.एम. वाल्टर के प्रयासों से हुई थी ।
- (2)इसका उद्देश्य राजस्थान के राजपूतों और दलितों के लिए सुधारात्मक कार्य करना था ।
- (3)इसकी प्रथम बैठक का आयोजन अजमेर में हुआ था ।
- (4)सभा ने अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सामाजिक नियम बनाए ।
उत्तर देखें
✓ (2) इसका उद्देश्य राजस्थान के राजपूतों और दलितों के लिए सुधारात्मक कार्य करना था ।
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