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जालौर के कान्हड़देव

कान्हड़देव जालौर के वे चौहान राजा थे जिन्होंने अलाउद्दीन खिलजी का विरोध किया; 1311 ई. में जालौर के पतन के समय वे लड़ते हुए मारे गए।

⏱ 2 मिनट पढ़ें✓ तथ्य जाँचे गए 16 अक्टूबर 2026

विषय-सूची

एक नज़र में

  1. अलाउद्दीन की विजय के बाद नए नाम: सिवाना खैराबाद (1308) · जालौर जलालाबाद (1311)।
  2. जालौर का विश्वासघाती: दहिया राजपूत बीका, जिसने खिलजी सेना को अरक्षित रास्ते से भीतर पहुँचाया।
  3. कमालुद्दीन गुर्ग: 1308 में सिवाना का प्रभारी बना, और 1311 में जालौर जीतने वाला सेनापति।

तथ्य

पितासामंतसिंह
शासनकाल1305–1311 ई. (RBSE पुस्तक); विकिपीडिया के विवरण में लगभग 1292 से, पहले पिता के साथ
राजधानीसोनगिरि (सुवर्णगिरि) पहाड़ी पर जालौर दुर्ग
पुत्रवीरमदेव
उन पर ग्रंथपद्मनाभ का कान्हड़दे प्रबंध

जालौर की वंशावली

  • नाडोल के आल्हण के पुत्र कीर्तिपाल ने 1181 ई. में जालौर शाखा की नींव रखी। सोनगिरि पहाड़ी के नाम से यह शाखा सोनगरा कहलाई।
  • क्रम: कीर्तिपाल · पुत्र समरसिंह · उनके पुत्र उदयसिंह · उदयसिंह के पुत्र चाचिगदेव · उनके पुत्र सामंतसिंह · उनके पुत्र कान्हड़देव।

अलाउद्दीन खिलजी से संघर्ष

  • गुजरात का रास्ता: कान्हड़दे प्रबंध के अनुसार कान्हड़देव ने अलाउद्दीन की सेना को गुजरात जाने के लिए अपने राज्य से रास्ता देने से इनकार किया।
  • 1305 ई.: ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी कान्हड़देव को समझाकर दिल्ली ले गया; अपमानित अनुभव कर वे दरबार छोड़कर लौट आए और युद्ध की तैयारी की।
  • नैणसी के अनुसार कारण: वीरमदेव ने सुल्तान की पुत्री फिरोजा से विवाह करने से इनकार किया।
  • सिवाना, 1308 ई. (RBSE पुस्तक के दुर्ग वाले अध्याय में लगभग 1310 ई.): अलाउद्दीन ने जालौर के आगे के दुर्ग सिवाना को लिया; उसका रक्षक शीतलदेव (सातलदेव) मारा गया।
  • जालौर, 1311 ई.: खिलजी सेना ने जालौर घेरा और विश्वासघात से भीतर पहुँची। कान्हड़देव लड़ते हुए मारे गए; अंतिम युद्ध के लिए राजा बनाए गए उनके पुत्र वीरमदेव भी कुछ ही समय बाद मारे गए, और स्त्रियों ने जौहर किया।

सिवाना तत्कालीन बाड़मेर जिले में, अब बालोतरा जिले में है; उसका दुर्ग दुर्गों वाले पृष्ठ पर है।

याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं

  • शीतलदेव (सातलदेव) · कान्हड़देवसिवाना के रक्षक (1308) · जालौर के राजा (1311)।
  • कान्हड़देव · हम्मीरजालौर 1311, नाडोल से निकली शाखा · रणथम्भौर 1301, पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र गोविन्दराज से चली शाखा।

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