एक नज़र में
- क्रम: आमेर, फिर जयपुर; बाद में अलवर जयपुर से अलग हुई।
- मुहम्मद शाह (RAS 2023): RPSC के उत्तर के अनुसार सवाई जयसिंह के दरबारी चित्रकार; उन्हें और साहिबराम को जयपुर शैली के प्रमुख चित्रकार माना जाता है।
- अलवर का स्वर्णकाल: विनयसिंह, अलवर की चित्रकला में उनका वही स्थान है जो मुगल चित्रकला में अकबर का।
- जयपुर की पहचान: आदमकद व्यक्ति-चित्र और भित्ति चित्रण; कलाकारों ने मुगल प्रभाव ग्रहण करते हुए राजपूती संस्कृति को बनाए रखा।
तथ्य
| उपशैलियाँ | आमेर, जयपुर, शेखावाटी, अलवर; उणियारा उपशैली; झिलाय, ईसरदा, शाहपुरा, सामोद ठिकाणा |
|---|---|
| स्वर्णकाल | जयपुर: सवाई प्रतापसिंह |
| कारखाना | जयपुर का सूरतखाना, सवाई जयसिंह के 36 कारखानों में एक |
| भित्ति पद्धति | आलागीला, जिसे आराइश या मोराकसी भी कहते हैं |
| विद्यालय | महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स, 1857 ई., अब राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स |
आमेर और जयपुर
| शासक या काल | विशेष |
|---|---|
| आमेर, प्रारंभिक काल | यशोधरा चरित्र (1591 ई.); अकबर के लिए रज्मनामा (1588 ई.) की प्रति सूरतखाने में, 169 बड़े चित्रों सहित; बैराठ (मुगल गार्डन) और मौजमाबाद के भित्ति-चित्रों में मुगल प्रभाव |
| मिर्जा राजा जयसिंह (1621–67 ई.) | रानी चन्द्रावती के लिए 1639 ई. में 'रसिकप्रिया' व 'कृष्ण रुक्मिणी री वेलि' बनवाए; 1639 ई. में निर्मित गणेश पोल भित्तिचित्रों से सुसज्जित |
| सवाई जयसिंह | रसिकप्रिया, कविप्रिया, गीतगोविन्द, बारहमासा, नवरस और रागमाला चित्र |
| सवाई ईश्वरीसिंह | सूरतखाना आमेर से जयपुर आया; साहिबराम के आदमकद व्यक्ति-चित्रों ने नई परंपरा डाली; लालचन्द ने जानवरों की लड़ाइयों के अनेक चित्र बनाए |
| सवाई माधोसिंह प्रथम | मणिकुट्टिम: रंगों के स्थान पर मोती, लाख व लकड़ी की मणियाँ; गलता के मंदिरों, सिसोदिया रानी के महल, चन्द्रमहल, पुण्डरीक की हवेली में भित्तिचित्र; लाल चितेरा इनके और ईश्वरीसिंह के समय के प्रमुख चित्रकार |
| सवाई प्रतापसिंह | सूरतखाने में पचास से अधिक कलाकार, जिनमें रामसेवक, गोपाल, हुकमा, चिमना, सालिगराम, लक्ष्मण प्रमुख; राधाकृष्ण लीला, नायिका भेद, रागरागिनी, बारहमासा |
- आलागीला: तैयार चूने के पलस्तर को घोंटकर चिकना कर उस पर चित्र बनाते हैं; आरंभ आमेर में, कछवाहा-मुगल संबंधों का परिणाम।
- ठिकाणा चित्रकला ईसरदा, सिवाड़, झिलाय, उणियारा, चौमू, सामोद, मालपुरा में विकसित हुई।
अलवर शैली
- अलवर शैली 1775 ई. में जयपुर से अलग होकर राव राजा प्रतापसिंह के समय स्वतंत्र हुई; शिवकुमार और डालूराम चित्रकार जयपुर से आए; राजगढ़ किले के शीशमहल के भित्तिचित्र प्रारंभिक सर्वोत्कृष्ट चित्र।
- बख्तावरसिंह: राजगढ़ के महलों में शीशमहल का चित्रण करवाया; बलदेव, डालूराम, सालगा, सालिगराम प्रमुख चितेरे; नाथों, जोगियों, फकीरों से धर्म-चर्चा करते महाराज के चित्र।
- विनयसिंह: बलदेव से चित्रकारी सीखते थे; बलदेव व गुलामअली ने सुलेखित 'गुलिस्ताँ' चित्रित किया।
- बलवन्तसिंह: सालिगराम, जमनादास, छोटेलाल, बकसाराम, नन्दराम ने पोथी, लघुचित्र व पटचित्र बनाए। शिवदानसिंह: कामकला पर आधारित चित्र। मंगलसिंह: मूलचंद व उदयराम ने हाथीदाँत पर चित्र। जयसिंह: रामगोपाल, जगमोहन, रामसहाय नेपालिया।
- पहचान: ईरानी, मुगल और जयपुर का समन्वय; पुरुषों के मुख साधारण; ठिगनी स्त्रियाँ, उठी हुई वेणियाँ; वेश्याओं के चित्र; सुन्दर बेलबूटों वाली वसलियाँ।
उणियारा और शेखावाटी
| शैली | विशेषता | चित्रकार |
|---|---|---|
| उणियारा | नरूका ठिकाना; रावराजा सरदारसिंह का आश्रय; बूंदी और जयपुर का प्रभाव; मीरबक्स का 'राम-सीता, लक्ष्मण व हनुमान' प्रसिद्ध चित्र | धीमा, मीरबक्स, काशी, रामलखन, भीम |
| शेखावाटी | जयपुर शैली के भित्ति चित्रांकन का सर्वाधिक प्रभाव; उन्नीसवीं सदी के मध्य से बीसवीं सदी के प्रारंभ तक श्रेष्ठियों की हवेलियाँ नवलगढ़, रामगढ़, फतेहपुर, लक्ष्मणगढ़, मुकुन्दगढ़, मंडावा, बिसाऊ में; 'ओपन आर्ट गैलरी'; हाथी, घोड़े, मल्लयुद्ध, कृष्ण लीला, रागरागिनी, लोककथाएँ; कत्थई, नीले व गुलाबी रंग |
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- दो जयसिंहमिर्जा राजा जयसिंह, आमेर, चन्द्रावती के लिए रसिकप्रिया (1639 ई.) · सवाई जयसिंह, जयपुर, सूरतखाना सहित 36 कारखाने।
- अलवर के चित्रकारजमनादास, छोटेलाल, बकसाराम, नन्दराम, सालिगराम (बलवन्तसिंह) · झालावाड़, बीकानेर या मारवाड़ के नहीं।
- नाथद्वारा और अलवरनाथद्वारा मेवाड़ में · अलवर और उणियारा ढूंढाड़ में।
खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
आरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2023 · प्रश्न 127
प्रसिद्ध चित्रकार मुहम्मद शाह जयपुर के किस महाराजा का दरबारी चित्रकार था ?
- (1)सवाई राम सिंह द्वितीय
- (2)सवाई जगत सिंह
- (3)सवाई प्रताप सिंह
- (4)सवाई जय सिंह
उत्तर देखें
✓ (4) सवाई जय सिंह
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