एक नज़र में
- सभी पात्र पुरुष निभाते हैं, स्त्री पात्र भी।
- जिस गाँव से गवरी आरंभ होती है, वही उसका खर्च वहन करता है।
- मंडली उन्हीं गाँवों में खेलती है जहाँ उसके सदस्यों की ब्याही बहनें और बेटियाँ रहती हैं।
तथ्य
| खेलने वाले | मेवाड़ के भील |
|---|---|
| कथा | शिव और भस्मासुर |
| आरंभ | रक्षाबंधन के दूसरे दिन, भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा (एकम) को, भोपा के खेड़ा देवी से आज्ञा लेने के बाद |
| अवधि | RBSE के अनुसार सवा महीना; अन्य विवरणों में लगभग 40 दिन |
| क्षेत्र | मुख्यतः उदयपुर और राजसमंद |
| वाद्य | मांदल और थाली |
| नियम | इस अवधि में शराब, माँस और हरी सब्जी का निषेध |
पात्र और खेल
- मुख्य पात्र बूढ़िया भस्मासुर का प्रतीक है; कुछ विवरणों में उसे शिव और भस्मासुर दोनों का प्रतीक माना जाता है। 'राया' स्त्री रूप में पार्वती और मोहिनी रूप वाले विष्णु के प्रतीक होते हैं।
- झामट्या लोकभाषा में कविता-पाठ करता है; खड़कड़्या उसे दोहराते हुए जोकर का काम करता है। अन्य पात्र 'खेला' कहलाते हैं।
- खेल: गणपति, भमरिया, भेआवड़, मीणा, कान-गूजरी, जोगी, खाड़लिया भूत, लाखा बणजारा, नटड़ी तथा माता और शेर।
कथा
- कथा के अनुसार शिव-भक्त भस्मासुर को वरदान मिला कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। विष्णु ने मोहिनी का रूप धरा; उसके नृत्य की नकल करते हुए असुर ने अपने ही सिर पर हाथ रख लिया और भस्म हो गया।
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- गवरी या गौरगवरी भीलों का शिव-भस्मासुर वाला नाट्य · गौर गरासियों की वैशाख शुक्ल चतुर्दशी की लीला, जिसे 'भख्योर की गणगोर' कहते हैं।
- गवरी या गैरगवरी रक्षाबंधन के बाद का भीलों का नाट्य · गैर मेवाड़ और बाड़मेर क्षेत्र का होली का डंडा-नृत्य।
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