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गवरी

गवरी मेवाड़ के भीलों का धार्मिक लोक नाट्य है, जो शिव-भस्मासुर की कथा पर आधारित है और जिसमें पौराणिक कथाओं, लोक-गाथाओं और लोक-जीवन की नृत्य-नाटिकाएँ होती हैं।

⏱ 2 मिनट पढ़ें✓ तथ्य जाँचे गए 15 अक्टूबर 2026

विषय-सूची

एक नज़र में

  1. सभी पात्र पुरुष निभाते हैं, स्त्री पात्र भी।
  2. जिस गाँव से गवरी आरंभ होती है, वही उसका खर्च वहन करता है।
  3. मंडली उन्हीं गाँवों में खेलती है जहाँ उसके सदस्यों की ब्याही बहनें और बेटियाँ रहती हैं।

तथ्य

खेलने वालेमेवाड़ के भील
कथाशिव और भस्मासुर
आरंभरक्षाबंधन के दूसरे दिन, भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा (एकम) को, भोपा के खेड़ा देवी से आज्ञा लेने के बाद
अवधिRBSE के अनुसार सवा महीना; अन्य विवरणों में लगभग 40 दिन
क्षेत्रमुख्यतः उदयपुर और राजसमंद
वाद्यमांदल और थाली
नियमइस अवधि में शराब, माँस और हरी सब्जी का निषेध

पात्र और खेल

  • मुख्य पात्र बूढ़िया भस्मासुर का प्रतीक है; कुछ विवरणों में उसे शिव और भस्मासुर दोनों का प्रतीक माना जाता है। 'राया' स्त्री रूप में पार्वती और मोहिनी रूप वाले विष्णु के प्रतीक होते हैं।
  • झामट्या लोकभाषा में कविता-पाठ करता है; खड़कड़्या उसे दोहराते हुए जोकर का काम करता है। अन्य पात्र 'खेला' कहलाते हैं।
  • खेल: गणपति, भमरिया, भेआवड़, मीणा, कान-गूजरी, जोगी, खाड़लिया भूत, लाखा बणजारा, नटड़ी तथा माता और शेर।

कथा

  • कथा के अनुसार शिव-भक्त भस्मासुर को वरदान मिला कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। विष्णु ने मोहिनी का रूप धरा; उसके नृत्य की नकल करते हुए असुर ने अपने ही सिर पर हाथ रख लिया और भस्म हो गया।

याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं

  • गवरी या गौरगवरी भीलों का शिव-भस्मासुर वाला नाट्य · गौर गरासियों की वैशाख शुक्ल चतुर्दशी की लीला, जिसे 'भख्योर की गणगोर' कहते हैं।
  • गवरी या गैरगवरी रक्षाबंधन के बाद का भीलों का नाट्य · गैर मेवाड़ और बाड़मेर क्षेत्र का होली का डंडा-नृत्य।

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