एक नज़र में
- वन आवरण (उपग्रह चित्रों से मापा गया वृक्ष-छत्र, ISFR), अभिलेखित वन क्षेत्र (अभिलेखों में वन के रूप में दर्ज भूमि, वृक्ष हों या न हों) और वृक्ष आवरण (अभिलेखित वन के बाहर के छोटे वृक्ष-खंड) तीन अलग माप हैं; देखें कि प्रश्न किसका नाम लेता है।
- हर वन-आँकड़े को उसके संस्करण या वर्ष के साथ याद करें: RAS 2023 ने ISFR 2021 का प्रतिशत पूछा, और दिसंबर 2024 में जारी ISFR 2023 ही अक्टूबर 2026 में भी सबसे नया संस्करण है।
- वन वर्षा के अनुसार हैं: अधिकांश वन पहाड़ी दक्षिण और पूर्व में हैं; शुष्क पश्चिम में कंटीले वन, झाड़ियाँ और घास हैं।
- जिले के क्षेत्रफल में सर्वाधिक अंश: अभिलेखित वन क्षेत्र (2024) में प्रतापगढ़, ISFR 2023 के वन आवरण में उदयपुर (तब आज के सलूंबर सहित, 23.60%); दोनों में सबसे कम चूरू।
वनस्पति कहाँ उगती है
उदयपुर, राजसमंद, कोटा, बारां, सवाई माधोपुर, चित्तौड़गढ़, सिरोही, बूँदी, अलवर, झालावाड़ और बांसवाड़ा के पहाड़ी जिलों में राज्य के लगभग आधे वन हैं।
पश्चिम की ओर वृक्ष बौने और बिखरे होते जाते हैं और झाड़ियाँ बढ़ती जाती हैं; जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर (तब आज का बालोतरा भी) और पश्चिमी जोधपुर (तब आज का फलौदी भी) में वृक्ष लगभग लुप्त हो जाते हैं। पहाड़ी की चोटी की अपेक्षा ढालों पर वनस्पति घनी होती है, क्योंकि मिट्टी और नमी नीचे जमा होती है। अति-चराई, वृक्षों की कटाई, खेती के लिए भूमि की सफाई और आदिवासियों द्वारा वालरा (स्थानांतरित) कृषि प्राकृतिक वनस्पति के नाश के मुख्य कारण हैं।
प्राकृतिक वनस्पति तीन प्रकार की है (जिले 1989 के अनुसार):
| प्रकार | कहाँ | प्रमुख पौधे |
|---|---|---|
| वन | पूर्व और दक्षिण-पूर्व | धोकड़ा, सागवान, सालर, महुआ, तेंदू, खैर, बाँस |
| घास के मैदान (बीड़) | झुंझुनूं, सीकर और अजमेर (तब आज के ब्यावर का भाग भी) के बड़े भाग; भीलवाड़ा (तब आज के ब्यावर का भाग भी), उदयपुर (तब आज का राजसमंद, सलूंबर और प्रतापगढ़ का भाग भी) और सिरोही के सीमित भाग | |
| मरुस्थलीय वनस्पति | अरावली के उत्तर-पश्चिम में: जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर (तब आज का बालोतरा भी), जोधपुर (तब आज का फलौदी भी) | खेजड़ी, कैर, बुई, रोहिड़ा, बबूल, बेर, जाल |
वन आवरण और वृक्ष आवरण (ISFR)
भारतीय वन सर्वेक्षण हर दो वर्ष में भारत वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) प्रकाशित करता है। वन आवरण वह सारी भूमि है जिसका क्षेत्रफल एक हेक्टेयर या अधिक हो और वृक्ष-छत्र 10% या अधिक हो, चाहे उसका स्वामित्व या कानूनी स्थिति कुछ भी हो। वृक्ष आवरण अभिलेखित वन क्षेत्र के बाहर एक हेक्टेयर से छोटे वृक्ष-खंड हैं, जिनमें गाँवों और शहरों में बिखरे वृक्ष भी आते हैं।
| संस्करण | वन आवरण (वर्ग किमी) | वृक्ष आवरण (वर्ग किमी) |
|---|---|---|
| ISFR 2021 | 16,655 (राज्य के क्षेत्रफल का 4.87%) | |
| ISFR 2023 | 16,548 (राज्य के क्षेत्रफल का 4.84%) | 10,841 |
ISFR 2023 में वृक्ष-छत्र घनत्व के अनुसार: अति सघन वन (70% और अधिक) 223.20, मध्यम सघन वन (40–70%) 4,237.41 और खुले वन (10–40%) 12,087.60 वर्ग किमी; झाड़ी क्षेत्र (10% से कम), जो वन आवरण में नहीं गिना जाता, 5,476.75 वर्ग किमी।
ISFR 2023 में राजस्थान का वृक्ष आवरण केवल महाराष्ट्र (14,525 वर्ग किमी) से कम है, और वन आवरण व वृक्ष आवरण मिलाकर 27,389 वर्ग किमी हैं।
ISFR 2023 ने 2021 के वन आवरण की बिना सामान्यीकरण गुणांक के पुनर्गणना 16,632 वर्ग किमी की है; 16,655 ISFR 2021 का अपना आँकड़ा है।
अभिलेखित वन क्षेत्र और कानूनी वर्ग
अभिलेखित वन क्षेत्र वह भूमि है जो सरकारी अभिलेखों में वन के रूप में दर्ज है, चाहे उस पर वृक्ष हों या नहीं। इसके तीन कानूनी वर्ग हैं (क्षेत्रफल 2024-25 के):
| वर्ग | क्या अनुमत है | क्षेत्रफल 2024-25 (वर्ग किमी) |
|---|---|---|
| आरक्षित वन | सरकारी संपत्ति; कटाई और चराई की अनुमति नहीं | 12,198.71 |
| रक्षित वन | नियमों के अंतर्गत चराई और कटाई की सुविधा | 18,671.49 |
| अवर्गीकृत वन | कटाई और चराई पर रोक नहीं; सरकार कुछ शुल्क लेती है | 2,150.12 |
| कुल | 33,020.32 |
वन क्षेत्र के अनुसार जिले
जिलेवार अभिलेखित वन क्षेत्र की 2024 की तालिका में कुल 33,014.02 वर्ग किमी (राज्य का 9.65%) है। यह तालिका अब भी अगस्त 2023 से पहले के मानचित्र के 33 जिलों पर आधारित है। पहले सबसे अधिक क्षेत्रफल वाले छह जिले, फिर अपने क्षेत्रफल में सबसे कम अंश वाले पाँच जिले:
| जिला | अभिलेखित वन क्षेत्र (वर्ग किमी) | जिले के क्षेत्रफल का अंश (%) |
|---|---|---|
| उदयपुर (आज के सलूंबर सहित) | 4,161.92 | 35.51 |
| बारां | 2,250.56 | 32.13 |
| करौली | 1,810.76 | 36.16 |
| चित्तौड़गढ़ | 1,789.02 | 22.87 |
| अलवर (आज के खैरथल-तिजारा और कोटपूतली-बहरोड़ के भाग सहित) | 1,786.58 | 21.31 |
| प्रतापगढ़ | 1,667.78 | 37.61 |
| चूरू | 79.92 | 0.58 |
| जोधपुर (आज के फलौदी सहित) | 246.95 | 1.09 |
| नागौर (आज के डीडवाना-कुचामन सहित) | 242.40 | 1.36 |
| जैसलमेर | 691.60 | 1.80 |
| बाड़मेर (आज के बालोतरा सहित) | 626.14 | 2.21 |
वनों के प्रकार
वन विभाग प्राकृतिक वनों के ये चार मोटे प्रकार बताता है:
| प्रकार | कहाँ | प्रमुख वृक्ष |
|---|---|---|
| उष्णकटिबंधीय कंटीले वन | पश्चिमी राजस्थान का शुष्क और अर्द्धशुष्क भाग: जोधपुर, पाली, जालौर, बाड़मेर, नागौर, चूरू, बीकानेर; ये धीरे-धीरे अरावली की पहाड़ियों के शुष्क पर्णपाती मिश्रित वनों में मिल जाते हैं | Acacia nilotica, Acacia leucophloea, Prosopis cineraria (खेजड़ी), Capparis aphylla, Zizyphus और Flacourtia की प्रजातियाँ |
| उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन | अरावली की उत्तरी और पूर्वी ढालों पर छोटे टुकड़ों में (अलवर, भरतपुर, धौलपुर); जालौर, नागौर, गंगानगर और बीकानेर की सूखी नदी-तलियों में बिखरे | Anogeissus pendula, Anogeissus latifolia, Acacia catechu, Terminalia tomentosa, T. bellirica, T. arjuna, Boswellia serrata, Dendrocalamus strictus, Lannea grandis |
| मध्य भारतीय उपोष्णकटिबंधीय पहाड़ी वन | सिरोही जिला, मुख्यतः आबू पर्वत के आसपास की पहाड़ियाँ, 700–800 मीटर पर सबसे अच्छे विकसित | अर्द्ध-सदाबहार और कुछ सदाबहार वृक्ष, हिमालय के उपोष्ण क्षेत्र जैसी वनस्पति |
| मिश्रित विविध वन | दक्षिण-पूर्व और पूर्व: चित्तौड़गढ़, कोटा, उदयपुर, सिरोही, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, बारां, झालावाड़ | Anogeissus pendula, Anogeissus latifolia, Terminalia tomentosa, T. arjuna, T. chebula, Albizia lebbeck, Dalbergia paniculata |
ISFR 2023 राजस्थान के वन आवरण और झाड़ी क्षेत्र को चैंपियन और सेठ वर्गीकरण (1968) के 20 वन प्रकारों में बाँटता है। सबसे बड़ा उत्तरी शुष्क मिश्रित पर्णपाती वन (5B/C2, मानचित्रित क्षेत्र का 38.15%) है, फिर Anogeissus pendula वन (14.72%) और शुष्क पर्णपाती झाड़ी (11.41%)।
खेजड़ी और मरुस्थलीय पौधे
| खेजड़ी | Prosopis cineraria। कई जिलों में खेजड़ा, जांट या जांटी और स्थानीय भाषा में जांदो भी कहते हैं; भारतीय धर्मग्रंथों में शमी; 'थार का कल्पवृक्ष' |
|---|---|
| खेजड़ी के उपयोग | पत्तियाँ (लूंग) चारे के काम आती हैं, हरी फलियों से सांगरी की सब्जी बनती है, छाल लोक-औषधि में और टहनियाँ ईंधन में। यह नाइट्रोजन स्थिर करती है, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है और इसके नीचे फसलें अच्छी होती हैं |
| रोहिड़ा | Tecomella undulata, जिसे रोहिरा, लूआर या मरुस्थलीय सागवान भी कहते हैं; कंटीले वन का वृक्ष, जिसकी लकड़ी फर्नीचर, औजार और छपाई के ब्लॉक बनाने में काम आती है |
| कैर | Capparis decidua, बालू के टीलों को बाँधने वाली झाड़ी; इसके फूल और फल का अचार बनता है या सब्जी पकती है |
| फोग | Calligonum polygonoides, 1–2 मीटर तक ऊँची झाड़ी; इसके फूल (फोगलो) खाए जाते हैं और इसका कोयला लोहा पिघलाने में काम आता है |
मरुस्थलीय वृक्ष दो प्रकार के हैं: वे जो उस वर्ष की वर्षा पर निर्भर हैं और वे जो मिट्टी की गहरी परतों के जल पर निर्भर हैं, जैसे कैर, खेजड़ी और बुई।
घासें: पोकरण और जैसलमेर के बीच सेवण, धामन और मुरात सबसे आम हैं, जो पशुओं और भेड़ों के लिए अच्छा चारा हैं। 2024 के CET (स्नातक) प्रश्नपत्र में सेवन, धमन और कराद को घास बताया गया है। हिंदी वर्तनी अलग-अलग मिलती है: सेवण (विकासपीडिया), सेवन (CET 2024) और सावन (भल्ला); धामन (भल्ला) और धमन (CET 2024)।
मरुस्थलीकरण, वृक्षारोपण से टीलों का स्थिरीकरण और केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) मृदा के नोट्स में हैं।
वन उपज
मुख्य उपज गोल लकड़ी, इमारती लकड़ी और जलाऊ लकड़ी है; गौण उपज में पत्तियाँ, फल, घास, गोंद, बाँस, कत्था, खस, शहद, मोम और जड़ी-बूटियाँ आती हैं। 1980 के दशक के अंत में धोकड़ा सबसे आम वृक्ष था, जो वन क्षेत्र के लगभग 60% भाग पर था; इसकी लकड़ी अधिकतर ईंधन और कोयले के काम आती है।
नीचे के जिले 1989 के अनुसार हैं: तब उदयपुर में आज के राजसमंद और सलूंबर भी थे; उदयपुर, चित्तौड़गढ़ और बांसवाड़ा, तीनों में आज के प्रतापगढ़ का भाग था; भरतपुर में आज का डीग; जयपुर में आज का दौसा और कोटपूतली-बहरोड़ का भाग; अलवर में आज का खैरथल-तिजारा और कोटपूतली-बहरोड़ का भाग; सवाई माधोपुर में आज का करौली; जोधपुर में आज का फलौदी।
| उपज | कहाँ | टिप्पणी |
|---|---|---|
| बाँस | बांसवाड़ा, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, सिरोही, भरतपुर | टोकरी, चारपाई, झोंपड़ी और कागज बनाने में |
| कत्था | उदयपुर, चित्तौड़गढ़, झालावाड़, बूँदी, भरतपुर, जयपुर | खैर के तने के भीतरी भाग के टुकड़ों को उबालकर बनता है; राज्य में 'हांडी प्रणाली' चलती थी, जिसमें 'कारखाना प्रणाली' से कम कत्था मिलता है |
| तेंदू पत्ते | उदयपुर, चित्तौड़गढ़, झालावाड़, बांसवाड़ा और बारां क्षेत्र (तब कोटा जिला) | बीड़ी बनाने में; लगभग आधे का उपयोग राजस्थान के बीड़ी केंद्रों (जयपुर, अजमेर, ब्यावर, कोटा, नसीराबाद, भीलवाड़ा, पाली) में होता है, शेष पड़ोसी राज्यों को जाता है |
| खस | भरतपुर, सवाई माधोपुर, टोंक | एक घास जिसकी जड़ों से तेल निकलता है; इत्र, कूलर की टाटियाँ, हाथ के पंखे और शरबत में काम आती है |
| गोंद | खेजड़ा, बबूल, ढाक, नीम, पीपल आदि वृक्षों से; पश्चिमी मरुस्थल का चौहटन क्षेत्र इसके लिए प्रसिद्ध है | |
| शहद और मोम | अलवर, भरतपुर, सिरोही, जोधपुर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बांसवाड़ा | वृक्षों और झाड़ियों पर जंगली मधुमक्खियों के छत्तों से |
| महुआ | डूंगरपुर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, झालावाड़, सिरोही | फल खाने, तेल बनाने और देशी शराब बनाने में |
राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता परियोजना (चरण-2)
| वित्त पोषण | जापान की JICA का ODA ऋण; ऋण समझौता जून 2011; ¥15,749 मिलियन स्वीकृत, ¥15,070 मिलियन वितरित |
|---|---|
| क्रियान्वयन एजेंसी | राजस्थान वन विभाग |
| क्षेत्र | 15 जिले (10 मरुस्थलीय और 5 गैर-मरुस्थलीय क्षेत्रों में) और 7 संरक्षित क्षेत्र तथा उनके आसपास के क्षेत्र |
| पद्धति | ग्राम वन सुरक्षा एवं प्रबंधन समितियों और पारिस्थितिकी विकास समितियों के माध्यम से समुदाय आधारित संयुक्त वन प्रबंधन |
| कार्य | वृक्षारोपण, मृदा एवं जल संरक्षण संरचनाएँ, अभयारण्यों में बाड़ और जल-स्थल, तथा स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आजीविका के कार्य |
| जैविक उद्यान | माचिया, जोधपुर विकसित; अभेड़ा, कोटा बाद में जोड़ा गया; नाहरगढ़ और सज्जनगढ़ का सुधार |
| पूर्णता | अक्टूबर 2021 |
याद रखें: ये अक्सर उलझते हैं
- पुरानी पुस्तकों में वनों का सर्वाधिक अंश: बांसवाड़ा, 1980 के दशक के अंत में लगभग 35%; तब प्रतापगढ़ जिला नहीं था, जो 2008 में चित्तौड़गढ़, उदयपुर और बांसवाड़ा के भागों से बना
- वनों के चार या सात प्रकार: वन विभाग चार प्रकार गिनाता है · पुरानी पुस्तकें सात (शुष्क सागवान, शुष्क पतझड़ या धोकड़ा, मिश्रित पतझड़, सालर, ढाक या पलास, उष्णकटिबंधीय कंटीले, उपोष्णकटिबंधीय सदाबहार); प्रश्न जिस सूची से हो, उसी से मिलाएँ
- खेजड़ी या विलायती खेजड़ाखेजड़ी देशी वृक्ष है · विलायती खेजड़ा बाहर से लाया गया, जिसे शुष्क क्षेत्रों में चारे और टीलों को रोकने के लिए उगाया जाता है
खुद को परखें: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
समान पात्रता परीक्षा (स्नातक स्तर) 2022 · प्रश्न 60
खस की घास मुख्य रूप से राजस्थान में पाई जाती है –
- (1)भरतपुर और टोंक वन विभाग में
- (2)पश्चिमी राजस्थान में
- (3)दक्षिण–पूर्वी राजस्थान (हाड़ौती) में
- (4)आबू पर्वत क्षेत्र में
उत्तर देखें
✓ (1) भरतपुर और टोंक वन विभाग में
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसमान पात्रता परीक्षा (स्नातक स्तर) 2024 · प्रश्न 48
सेवन, धमन और कराद ____________ हैं।
- (1)लोक नृत्य के प्रकार
- (2)मरुस्थल मृदा
- (3)घास के प्रकार
- (4)राजस्थानी चित्रकला (पेंटिंग्स) रूप के प्रकार
उत्तर देखें
✓ (3) घास के प्रकार
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंसमान पात्रता परीक्षा (सीनियर सैकण्डरी स्तर) 2024 · प्रश्न 52
उपोष्णकटिबंधीय पर्वतीय वनों के बारे में असत्य कथन का चयन करें। (निम्न में से सबसे उपयुक्त विकल्प चुनें:)
- (1)यह वन केवल राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं।
- (2)उपोष्णकटिबंधीय पर्वतीय वन केवल राजस्थान के माउंट आबू क्षेत्र में पाए जाते हैं।
- (3)इन वनों में हरियाली स्थायी रूप से उपलब्ध रहती है।
- (4)यह वन सिरोही में पाए जाते हैं, जो कि राजस्थान में स्थित है।
उत्तर देखें
✓ (1) यह वन केवल राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं।
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंआरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2023 · प्रश्न 5
भारत राज्य वन रिपोर्ट 2021 के अनुसार, वनस्पति आवरण के संदर्भ में वन क्षेत्र 16,654 वर्ग किमी है व राजस्थान के भौगोलिक क्षेत्र का ________ प्रतिशत है ।
- (1)6.74
- (2)7.48
- (3)8.47
- (4)4.87
उत्तर देखें
✓ (4) 4.87
पूरा प्रश्न-पत्र देखेंआरएएस प्रारंभिक परीक्षा 2024 · प्रश्न 75
राजस्थान वानिकी एवं जैव-विविधता परियोजना (फेज-2) के संदर्भ में गलत कथन का चयन कीजिए ।
- (1)इसे जापानी अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जे आई सी ए) द्वारा सहायता प्रदान की गई ।
- (2)इसमें 18 ज़िले एवं 8 वन्यजीव अभयारण्य सम्मिलित हैं ।
- (3)इस परियोजना में अभेडा एवं माचिया जैविक पार्क विकसित किए गए हैं ।
- (4)इस परियोजना में जल संरक्षण को भी सम्मिलित किया गया है ।
उत्तर देखें
✓ (2) इसमें 18 ज़िले एवं 8 वन्यजीव अभयारण्य सम्मिलित हैं ।
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